फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Ram Mandir: आज भी याद है श्मशान की वो रात; बिस्तर के नीचे चुभ रही थी हड्डियां, रामेश्वर चौहान ने बताई कहानी

Wed, 17 Jan 2024 10:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो राहुल शर्मा, यमुनानगर (हरियाणा)

सार

जगाधरी के रामेश्वर चौहान ने यात्रा सहित पूरे आंदोलन की आंखों देखी साझा की। बताया कि सोने के लिए टेंट में जगह मिली, पर देर रात पता चला कि सरयू तट से चार किलोमीटर दूर नाव है, उससे रात के अंधेरे में सरयू को पार किया और सीताराम शरण आश्रम में रुके। अगली सुबह मंदिर पहुंचे, जहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस थी।
विज्ञापन
रामेश्वर चौहान - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जिस साल श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन जोरों पर था, उसी वर्ष 1990 में एक रथयात्रा भी निकाली गई, जो उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से होकर हरियाणा में कलानौर के रास्ते यमुनानगर पहुंची। यात्रा का ठहराव जगाधरी अनाज मंडी में हुआ। यहां नेताओं ने राम भक्तों को आंदोलन में एकजुट किया। इसके साक्ष्य के तौर पर फोटो उपलब्ध कराते हुए जगाधरी की विश्वकर्मा कॉलोनी निवासी रामेश्वर चौहान ने यात्रा सहित पूरे आंदोलन की आंखों देखी साझा की। उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान श्मशान की वो रात आज भी याद है, जब बिस्तर के नीचे हड्डियां चुभ रहीं थीं। फिलहाल रामेश्वर चौहान भाजपा से पिछड़ा मोर्चा के पंजाब प्रभारी हैं। वे हरकोफेड हरियाणा के पूर्व चेयरमैन भी रह चुके हैं।

विज्ञापन


उन्होंने बताया कि वे श्रीराम जन्मभूमि के सभी आंदोलनों में सहभागी रहे हैं। साथ ही वर्ष 1990 में जगाधरी मंडी पहुंची रथ यात्रा के ठहराव का प्रबंधन भी उन्होंने किया था। तब वह भाजपा में महासचिव थे। उन्होंने बताया कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में वर्ष 1988 में यमुनानगर से 48 लोग अयोध्या पहुंचे थे, जिनमें वह भी थे। रात में उन्हें जहां ठहराया गया, वहां पूरी रात सोते समय बिस्तर में कुछ चुभता रहा। अगली सुबह देखा कि नीचे जो चुभ रहा था, वो हड्डियां थीं। पता किया तो पाया हम पूरी रात श्मशान घाट में थे।

इसके बाद वर्ष 1989 में राम शिला पूजन प्रचार प्रसार कार्यक्रम से एक रात पहले अयोध्या पहुंचे। इसके बाद वर्ष 1990 में यमुनानगर से करीब 450 लोग अयोध्या की ट्रेन में चढ़ने को अंबाला निकले, पर रास्ते में काफी लोग पुलिस ने पकड़ लिए। वह और अन्य साथी छिपते हुए ट्रेन में चढ़े और लखनऊ पहुंच गए। इसके आगे जंगल, खेतों व कच्चे रास्तों से सरयू तट पहुंचे। इस बीच ग्रामीणों ने खाने-पीने की मदद की। सरयू तट पर काफी देर पुलिस से मुठभेड़ हुई, जिसमें काफी कारसेवक सरयू में डूब गए। कुछ लोग वापस चले गए, पर वह व अन्य साथी मंदिर पहुंचने की जिद पर अड़े रहे। रात में बुखार हो गया और भूख भी लग रही थी।
विज्ञापन


सोने के लिए टेंट में जगह मिली, पर देर रात पता चला कि सरयू तट से चार किलोमीटर दूर नाव है, उससे रात के अंधेरे में सरयू को पार किया और सीताराम शरण आश्रम में रुके। अगली सुबह मंदिर पहुंचे, जहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस थी। हनुमानगढ़ी चौक तक पहुंचे थे, तभी एक साधु आया और वहां खड़ी पुलिस बस में चढ़ा और बैरिकेड तोड़ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की तरफ बढ़ा। यह देख पुलिस ने गोलियां बरसाईं। आंखों के सामने गोली लगने से एक कारसेवक नीचे गिर गया, जिसे संभाल दूर ले गए। इसके बाद दो दिन रस्सी से पहाड़ पर चढ़ने की रिहर्सल की। फिर पांच दिसंबर को विवादित ढांचा गिराने में कार सेवा की। इस बीच घायल कारसेवकों के इलाज में मदद की। 

पुलिस को यूं दिया चकमा
रामेश्वर चौहान ने बताया कि आंदोलन के दौरान उनकी मेटल फैक्ट्री थी, जिसकी 1990 में अयोध्या जाते समय आर्डर सेल बुक बैग में रख ली थी। ट्रेन में एक जगह पुलिस ने पकड़ा तो बताया कि वह सेल एजेंट हैं और बनारस अपने कारखाने के बर्तनों के आर्डर लेने जा रहे हैं। पुलिस जब उनके साथी संदीप राय को पकड़ने लगी तो बताया कि ये उनका भतीजा है, जिसे काम सिखाने के लिए ले जा रहे हैं। लखनऊ पहुंचने पर होटल में रुके, वहां पुलिस पहुंची तो बताया कि वे लोग कॉलेज टूर पर आए हैं। इसके बाद लखनऊ से वह व सभी साथी अयोध्या कूच कर गए।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें