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Agriculture: ताई की कैंसर से मौत हुई तो हरियाणा के इस किसान ने प्राकृतिक खेती से जोड़ा नाता

Mon, 23 Jan 2023 09:01 AM IST
भूपेंद्र सिंह पंकज बत्रा, बिलासपुर, यमुनानगर (हरियाणा)

सार

किसान अनिल तीन एकड़ में गन्ना और दलहन की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे। गन्ने से गुड़ और शक्कर बनवाकर दूसरे राज्यों में भी आपूर्ति करते हैं। प्रेरित होकर गांव के दूसरे किसान भी प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं।
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गांव बसातियांवाला में प्राकृतिक खेती से तैयार गन्ने को दिखाते किसान अनिल कुमार। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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हरियाणा के यमुनानगर जिले के बिलासपुर क्षेत्र के गांव बसातियांवाला के किसान अनिल कुमार न केवल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। छह साल से गांव में तीन एकड़ जमीन पर गन्ना, गेहूं, दलहन व धान की फसल उगा रहे हैं। प्राकृतिक खेती करके उगाए गए गन्ने को वह शुगर मिल या क्रशर में नहीं बेचते, बल्कि उससे गुड़ और शक्कर बनवाकर चंडीगढ़, दिल्ली, यमुनानगर, अंबाला समेत अन्य जगहों पर आपूर्ति करते हैं।

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स्थिति यह है कि अगले सीजन में तैयार होने वाली गुड़, शक्कर की छह माह पहले ही एडवांस बुकिंग हो जाती है। दूरदराज के लोग मोबाइल पर संपर्क करके ही अपने बजट के हिसाब से गुड़, शक्कर तैयार करा लेते हैं। ऐसे में अनिल कुमार से प्रभावित होकर अब उपमंडल बिलासपुर के आधा दर्जन से अधिक अन्य किसान भी प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।

अनिल कुमार-43 ने बताया कि उनकी ताई की वर्ष-2016 में कैंसर से मौत हो गई थी। तब शोक सभा में लोग बातें कर रहे थे कि आजकल खाने का सामान केमिकल से तैयार हो रहा है। जहरीली खेती से बीमारियां बढ़ रही हैं, इसलिए कम उम्र में ही लोग अब दुनिया से विदा होने लगे हैं।
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अनिल के अनुसार, यह बातें उनके मन और दिमाग में घर कर गई। तभी उन्होंने निश्चय किया कि वह कम से कम अपने परिवार के लिए तो खेतों में प्राकृतिक खेती करेंगे, ताकि बिना केमिकल से तैयार अनाज को खाकर वह स्वस्थ रहें। इसके लिए वह जीरो बजट प्राकृतिक खेती के लिए मशहूर पद्मश्री सुभाष पालेकर के संपर्क में आए।

पंचकूला व महाराष्ट्र में जाकर उनके शिविर ज्वाइन किए। उनकी लिखी किताबें पढ़ी। फिर 2017 में उन्होंने अपने खेतों में तीन एकड़ से प्राकृतिक खेती की शुरुआत की। अनिल कुमार ने बताया कि यूरिया डालकर पैदा किए गए प्रति एकड़ गन्ने से यदि किसी किसान को 90 हजार रुपये की आमदनी होती है तो वह देसी गाय के गोबर व गोमूत्र से खेती करके प्रति एकड़ औसतन डेढ़ से पौने दो लाख रुपये की फसल लेते हैं। कीटनाशक डालने से खेत में 400 क्विंटल तक गन्ना निकलता है, वहीं प्राकृतिक खेती से औसतन 250 क्विंटल गन्ना पैदा होता है। इसके बाद वह गन्ने से क्रशर में किराया देकर गुड़ व शक्कर बनवाते हैं।

खेती के लिए ही रखी है दो देसी गाय
अनिल ने बताया कि प्राकृतिक खेती केवल देसी गाय के गोबर से ही हो सकती है। इसके लिए उन्होंने दो देसी गाय रखी है। गाय के गोबर, गोमूत्र व लस्सी का मिश्रण तैयार करके फसल में डाला जाता है। गन्ने के साथ वह मूंग या उड़द की दाल उगा सकते हैं। मिश्रित खेती करने से गन्ना अच्छा होता है। वहीं प्राकृतिक खेती में पानी बहुत कम लगता है। इसमें केवल खेत में नमी रखनी होती है। एक देसी गाय के गोबर, गोमूत्र से 20 से 30 एकड़ में खेती की जा सकती है। देसी गाय के गोबर के प्रयोग से केंचुए बढ़ते हैं जो कि भूमि को उपजाऊ बनाते हैं। प्राकृतिक खेती के लिए खेत का ऊंचा होना जरूरी है ताकि उसमें दूसरे खेतों से केमिकल वाला पानी न आए। अब वह दूसरे खेतों को भी ऊंचा करके उनमें प्राकृतिक खेती करेंगे।

स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक खेती जरूरी : अनिल
अनिल कुमार ने बताया कि यदि हम सबको स्वस्थ रहना है तो किसानों को प्राकृतिक खेती अपनानी ही होगी। ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में सुभाष पालेकर कृषि विधि ही फायदेमंद है। इससे देसी गाय को भी बढ़ावा मिलेगा। उनको देख कर अब गांव संधाय के पवन अहलावत, दरियांपुर के हरविंद्र सिंह, कपूरी के परमजीत सिंह, शाहपुर से विजय भी प्राकृतिक खेती करने लगे हैं।

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