संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 19वें दिन महा साध्वी सुचेता महाराज ने भजन के माध्यम से समझाया कि भगवान का अस्तित्व और उनकी कृपा तभी प्रकट होती है जब सच्चे भक्त होते हैं। उन्होंने कहा, जब भक्त नहीं होंगे तो भगवान कहां होगा, हर एक समस्या का समाधान कहां होगा, मेहमान हुए लाखों मेहमानी भी पर भक्त सुदामा सा मेहमान कहां होगा।
उन्होंने कहा कि हर प्राणी को यह सोचकर व्यवहार करना चाहिए कि हर जीव में आत्मा का वास है। जैन धर्म अहिंसा परमो धर्म में विश्वास रखता है। इंसान और जानवर की आत्मा में कोई फर्क नहीं होता। इसी को दृष्टांत से समझाते हुए उन्होंने बताया कि एक बार भक्त नामदेव रोटियां बना रहे थे। बहुत मेहनत से रोटी बनाई जा रही थी। इतने में एक कुत्ता आया और उनकी रोटियां उठाकर भागने लगा। भगवान नामदेव फटाफट खड़े हुए और उस कुत्ते के पीछे घी की कटोरी लेकर भागने लगे और बोले प्रभु यह सूखी रोटियां आप से खाई नहीं जाएंगी आप कृपया घी भी ले जाओ ताकि आपको इनको खाने में दिक्कत न हो।
उन्होंने कहा कि आज के समय में इस प्रकार की दया, करुणा की भावना समाज में देखने को नहीं मिलती। आज हम अहंकार और स्वार्थ में एक दूसरे का नुकसान करके खुद आगे बढ़ने के चक्कर में जुटे हुए हैं जिसके कारण हमारे मन की शांति और समरसता समाप्त हो चुकी है।
इसके बाद महा साध्वी समीक्षा महाराज ने आज दूसरी भावना की विस्तार से व्याख्या की। पहली भावना अनित्य की भावना थी जबकि दूसरी भावना अशरण की भावना है। अशरण मतलब अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने की भावना, असत्य से सत्य की ओर जाने की भावना, बुराई से अच्छाई की तरफ, अहंकार से मस्ती की तरफ और दुराचार से सदाचार की ओर जाने की भावना। उन्होंने कहा कि यह दुनिया एक सराय है।
आपको अशरण की भावना अपने मन में पाल लेनी चाहिए। यह दुनिया आपका स्थायी निवास नहीं है, यह तो केवल आपको और आपकी आत्मा को आपके पिछले जन्म के पुण्य कर्मों के कारण मानव जीवन मिला है जिसका सदुपयोग आप अपने दया धर्म करके उठा सकते हैं। इसके बाद आपका आखिरी पड़ाव है जो अंतिम मंजिल है वहां जा सकते हो और मुक्ति पा सकते हो। यदि यहां आपका आचरण शुद्ध नहीं होगा तो समझ लीजिए आपको फिर इन्हीं नरक की योनियों में भटकना पड़ेगा।