यमुनानगर। लक्कड़ मंडी मंडौली के आढ़तियों द्वारा की गई हड़ताल ने लकड़ी की खरीद में की जा रही हेराफेरी के बाजार को फिर से गरमा दिया है। लकड़ी की खरीद का खेल काफी पुराना और गहरा भी है। सारा खेल कच्चे बिल का है। कई प्लाईवुड फैक्टरियों में 18 प्रतिशत जीएसटी व एक प्रतिशत मार्केट फीस को बचाने के लिए कच्चे बिल पर आढ़तियों से लकड़ी की खरीद की जा रही है।
मंडी के आढ़तियों की मांग पर मार्केट कमेटी के अधिकारियों ने प्लाईवुड फैक्टरियों में जांच करने की बात कही है। टीम फैक्टरियों में मंडियों से खरीदी गई लकड़ी और फैक्टरी में लकड़ी से तैयार किए गए माल की जांच की जाएगी। वहीं मंडी के बाहर लकड़ी बिकने से सरकार को भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। मार्केट कमेटी यमुनानगर के सचिव गौरव आर्य का कहना है कि जल्द ही फैक्टरियों में जांच की जाएगी।
मंडौली व मानकपुर की लक्कड़ मंडियों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार व ओड़िसा समेत अन्य राज्यों से ट्रैक्टर-ट्रालियों व ट्रकों में लकड़ी आती है। करीब आठ साल पहले तक यमुनानगर की लक्कड़ मंडियों में रोजाना 1000 से 1200 ट्रैक्टर-ट्रालियों में लकड़ी आती थी परंतु अब इन ट्रालियों की संख्या औसत 400 रह गई है। इतनी मात्रा में लकड़ी का कम होना अपने आप में ही कई सवाल खड़े करता है।
मंडी से ज्यादा सड़क पर बिकती है लकड़ी
दरअसल मंडियों में जो लकड़ी आती है उसमें से 50 प्रतिशत ट्रालियां ही मंडी के अंदर जाती हैं क्योंकि एक बार ट्राली मंडी के अंदर चली गई तो उसका गेट पास कटता है। साथ ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होने पर लकड़ी पर एक प्रतिशत मार्केट फीस व 18 प्रतिशत जीएसटी देनी पड़ेगी। इससे प्लाईवुड फैक्टरी संचालकों को नुकसान है। टैक्स बचाने के लिए मंडी से बाहर ही सड़क पर लकड़ी खरीद ली जाती है।
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जिले में हैं 300 प्लाईवुड इकाइयां
जिले में 300 प्लाईवुड इकाइयां हैं। जिनमें रोजाना 7000 क्यूबिक मीटर प्लाई का रोजाना उत्पादन होता है। इसके अलावा 400 से अधिक पिलिंग यूनिट व सॉ मिल हैं। गत तीन माह के दौरान मंडौली लक्कड़ मंडी में आई लकड़ी के आंकड़ों पर गौर करें तो यह काफी चौकाने वाले हैं। नवंबर में रोजाना औसतन 15821 क्विंटल, दिसंबर में 19685 क्विंटल व जनवरी में 19046 क्विंटल लकड़ी ही मंडी में आई। 300 में से यदि आधी फैक्टरियों ने मानकपुर मंडी और बाकी की 150 ने मंडौली मंडी से लकड़ी खरीदी तो रोजाना का औसतन 100 से 120 क्विंटल का आता है। अब एक फैक्टरी में क्या रोजाना 100 से 120 क्विंटल ही लकड़ी की खपत होती है। जबकि सॉ मिल में भी लकड़ी जाती है। जबकि फैक्टरियों में लकड़ी के ढेर लगे पड़े हैं।
फैक्टरियों की जांच होनी चोहिए : नीटू राणा
लक्कड़ मंडी मंडौली आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान नीटू राणा का कहना है कि असली खेल फैक्टरियों में ही चल रहा है। फैक्टरी संचालक मंडी में आई लकड़ी को नहीं खरीदते। वह बिना बिल या फिर कच्चे बिल पर ही लकड़ी खरीदते हैं, क्योंकि पक्का बिल कटा तो उस पर जीएसटी देनी पड़ेगी। इसलिए फैक्टरियों में जो माल तैयार हो रहा है और कितनी लकड़ी आई उसकी जांच की मांग काफी समय से की जा रही है।
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बाहर से भी लकड़ी खरीदते हैं : जेके बिहानी
हरियाणा प्लाईवुड मेन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष जेके बिहानी का कहना है कि फैक्टरियों में मंडी के अलावा बाहर से भी लकड़ी आती है। फैक्टरियों में लकड़ी की खपत का कोई अंदाजा या रिकॉर्ड नहीं है। उत्पादन क्षमता के आधार पर लकड़ी की खपत होती है। जो आढ़ती खरीद का बिल नहीं लेते वह फैक्टरी में भी नहीं देते हैं। इसलिए हर किसी की अपनी समस्या है।