यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 40वें दिन महा साध्वी सुचेता ने फरमाया कि व्यक्ति को हर सूरत में अपनी श्रद्धा अखंड रखनी चाहिए। मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक की श्रद्धा अखंड है तो उसे संयम के महा सुख के सामने देवों का सुख भी तुच्छ लगता है।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर स्वामी ने आचरंग सूत्र में कहा है कि साधक जिस श्रद्धा के साथ साधना पथ पर प्रथम पद रखता है उसमें अंतिम कदम तक विपरीतता नहीं आने देनी चाहिए। भावनाएं सदा एक जैसी नहीं रहती। आत्मा की भाव धारा का ग्राफ बदलता रहता हैं। दुनिया में तीन प्रकार के मानव हैं श्रद्धालु, अश्रद्धालु और अंध श्रदालु। श्रद्धा दान देती है, अश्रदा भटकाती है, अंध श्रदा भयंकर पतन कराती है।
उन्होंने ज्ञानियों ने श्रद्धा की अटूटता को संयम साधना का ड्राइविंग फोर्स बताया है। श्रद्धा का संबल टूट गया तो मानसिक शक्तियां भी नष्ट हो जाती हैं। यही कमजोरी साधना को फलीभूत नहीं होने देती। श्रद्धा पत्थर को भी मूर्ति बना देती है और मनचाहा फल देता है। एकलव्य ने केवल अपने गुरु द्रोणाचार्य की श्रद्धा में पत्थर की मूर्ति बनाई थी यह केवल श्रद्धा का ही फल था कि उन्होंने मूर्ति को अराध्या मानकर उसने धनुर्विद्या सीखी। धनुर्विद्या में महारत हासिल की इसलिए कहते हैं। श्रद्धा यदि आपकी सच्ची है तो आपको मनचाहा फल मिल सकता है।