हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड के एक्सईएन जगाधरी अनाजमंडी की दशा सुधारने के पीछे बजट न होने की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन करीब तीन साल पहले इसी अनाजमंडी में बोर्ड की ओर से 29 लाख रुपये बेवजह खर्च कर दिए। मंडी के गेट पर फसल तोलने के लिए चार कांटे लगाए गए, लेकिन ये किसी काम के नहीं हैं।
कांटे एक दो सीजन में ही चल पाए। हर सीजन में कांटे क्यों नहीं चल पाते इसका जवाब अधिकारियों के पास भी नहीं है। लाखाें खर्च करने के बाद भी बोर्ड इसे आय का साधन नहीं बना पाया।
अब इसे चालू करना तो क्या इसकी देखरेख के लिए भी कोई कर्मचारी नहीं है। देखरेख के अभाव में ये कांटे जंग की भेंट चढ़ रहे हैं। किसानों और आढ़तियों के लिए ये कांटे अब सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि कांटों की देखरेख का काम निजी कंपनी को दिया है।
सीवरेज और सड़कों की थी ज्यादा जरूरत
मंडी को बने 30 साल हो गए हैं। मंडी बनने के बाद से यहां एक बार भी सड़कें दोबारा से नहीं बन पाई, मंडी में खरीद सीजन के दौरान सबसे बड़ी परेशानी पानी निकासी न होने की होती है। अगर हल्की सी भी बारिश हो जाए, तो किसान फसल पर तिरपाल व अन्य साधन जुटा बचा लेता है, लेकिन मंडी लबालब होने से पानी नीचे से फसल में घुस जाता है, जिससे किसान की छह माह की मेहनत पानी में बह जाती है। एक बार फसल भीग जाने के बाद इसे लेने के लिए कोई खरीद एजेंसी तैयार नहीं होती।
किसी यूज के नहीं कांटे
मंडी में लगे कांटे अगर देखा जाए तो किसी यूज के ही नहीं हैं। क्योंकि जो किसान मंडी में फसल लेकर आता है, उसकी फसल की खरीद फड़ पर साफ सफाई के बाद वहीं पर बोरी में डालने पर तोली जाती है। इसके साथ ही खरीद एजेंसियों की ओर से जब यहां से उठान किया जाता है तो दोबारा से जो तुलाई होती है। वे बाहर के किसी कांटे से कराते हैं। ऐसे में साफ है कि अगर ये कांटे चला भी दिए जाएं तो किसान और आढ़तियों को इससे कोई लाभ नहीं होने वाला। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि कांटे इसलिए लगाए गए थे, कि किसान अपनी फसल को तोल कर ही मंडी के अंदर लाए, ताकि उसके साथ मंडी में किसी तरह की घपले बाजी न हो।
कांटों के खर्च में चमक जाती मंडी
कांटों पर मार्केट कमेटी की कंट्रक्शन विंग की ओर से 29 लाख खर्च किए थे, जानकारों की मानें तो उस समय कांटों पर किए गए खर्च से मंडी की दशा सुधारी जा सकती थी। इतने ही बजट से मंडी की सबसे बड़ी दिक्कत सड़कों की अच्छे से रिपेयरिंग हो सकती थी, लेकिन बोर्ड की ओर से स्थिति सुधारने के बजाय कांटे लगाना मुनासिफ समझा। अब जब कांटे लगे हैं तो इससे आय का साधन भी बोर्ड बनाने में सफल नहीं रहा। इसके पीछे भी बोर्ड की अपनी ही कुछ खामियां देखी जा रही हैं।