संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे कार्यक्रम के 13वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति ने संगत से कहा कि इस संसार में तीन तरह के संबंध होते हैं। पहला संबंध होता है खून का जैसे माता-पिता, भाई-बहन। दूसरा संबंध होता है दिल का रिश्ता जैसे पति-पत्नी, दोस्त, सामाजिक मित्र। तीसरा रिश्ता होता है आत्मा का जैसे हमारे गुरु।
उन्होंने बताया कि पहले दो रिश्ते भी दो तरह के प्यार के और स्वार्थ के होते हैं। स्वार्थ का अर्थ है खुद से मतलब होना। आजकल ज्यादातर रिश्ते स्वार्थ के कारण चलते हैं। हर व्यक्ति एक दूसरे से अपना स्वार्थ पूरा कर रहा है। यदि कोई किसी से रिश्ता निभा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि वहां से उसका स्वार्थ पूरा हो रहा है। स्वार्थ खत्म तो रिश्ता भी समाप्त हो जाता है। हर रिश्ता स्वार्थ की दीवार पर खड़ा है। मतलब निकलते ही व्यक्ति आंख मिलाना भी छोड़ देता है।
हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर सच्चे दिल से और निस्वार्थ भाव से रिश्ते निभाने चाहिएं। स्वार्थ वाले रिश्ते क्षणभंगुर होते हैं, उनकी जरूरत स्वार्थ सिद्धि तक सीमित होती है। स्वार्थ सिद्धि के साथ स्वत: यह समाप्त हो जाते हैं। केवल आत्मा का रिश्ता है, जो अजर, अमर और पूर्णतया स्थाई होता है। इसलिए हमें आत्मा का रिश्ता ही निभाना चाहिए। व्यक्ति और आत्मा का रिश्ता बहुत गहरा और महत्वपूर्ण है।
आत्मा व्यक्ति की अंतरात्मा है, जो उसके विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को नियंत्रित करती है। यह रिश्ता इसलिए महत्वपूर्ण है कि आत्मा व्यक्ति को अपने असली स्वरूप को पहचानने में मदद करती है। यह व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य व अर्थ को समझने में मदद करती है।आत्मा व्यक्ति को नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों का पालन करने में मदद करती है।
यह व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को संतुलित करने में मदद करती है। आत्मा व्यक्ति को अपने जीवन में शांति और संतुष्टि प्राप्त करने में मदद करती है। इस प्रकार व्यक्ति और आत्मा का रिश्ता बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को अपने जीवन को सार्थक और संतुलित बनाने में मदद करती है।