साढौरा। शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में बसा साढौरा केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, आस्था और सांप्रदायिक सौहार्द की जीवंत विरासत है। सदियों पुराने मंदिर, सूफी संतों की दरगाह, ऐतिहासिक गुरुद्वारे, प्राचीन मस्जिदें और दुर्लभ भित्ति चित्र गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं। धरोहरें आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
तोरांवाला तालाब के तट पर स्थित प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर अपनी दुर्लभ भित्ति चित्रकला के लिए विशेष पहचान रखता है। मंदिर की भीतरी दीवारों पर उकेरे गए चित्र 15वीं और 16वीं शताब्दी के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल के माने जाते हैं। इन चित्रों में भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं के साथ भगवान गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, प्रह्लाद तथा घोड़े पर सवार योद्धाओं के जीवंत चित्र अंकित हैं, जो तत्कालीन कलाकारों की अद्भुत कला और तन्मयता को दर्शाते हैं।
नकटी नदी के तट पर स्थित सूफी संत हजरत सैय्यद शाह महय्युद्दीन सानी कुमैसुल आजम की दरगाह, जिसे रोजापीर के नाम से जाना जाता है, देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। कादरी संप्रदाय की हिंदुस्तान की पहली तथा अविभाजित पंजाब की सबसे बड़ी गद्दी मानी जाने वाली इस दरगाह पर उर्स के दौरान हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग समान श्रद्धा से जियारत करते हैं।
साढौरा की पहचान 400 वर्ष पुरानी किन्नरों की ऐतिहासिक गद्दी से भी जुड़ी है। वर्तमान गुरु विजेता आज भी सिरमौर रियासत के तत्कालीन शासकों द्वारा जारी ताम्रपत्र और हुक्मनामों को सुरक्षित संभालकर रखे हुए हैं। इन दस्तावेजों में किन्नर समाज को सामाजिक मान्यता और सम्मान देने का उल्लेख मिलता है। हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में इस गद्दी के अनुयायी आज भी परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। संवाद
श्रीराम-जानकी मंदिर की अनूठी पहचान
गगड़वाला सरोवर के तट पर स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर भी अपनी अनूठी पहचान रखता है। यहां स्थापित भगवान श्रीराम और माता सीता की श्यामवर्णीय प्राचीन प्रतिमाएं श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। स्कंद पुराण के हिमाद्रिखंड में इस स्थल का उल्लेख महर्षि गर्ग की तपोभूमि के रूप में मिलता है। मनोकामना सरोवर स्थित मंदिर में मां दुर्गा की मुगलकालीन प्रतिमा, बालू से निर्मित भगवान गणेश की प्रतिमा तथा तीर्थों की मिट्टी और जल से निर्मित हनुमान प्रतिमा धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
जित्रोंवी मस्जिद कला की उत्कृष्ट मिसाल
कस्बे में 16वीं और 17वीं शताब्दी में निर्मित काजी वाली मस्जिद और जित्रोंवी मस्जिद तत्कालीन मुस्लिम स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं। वहीं बाबा बंदा सिंह बहादुर ने ढयोढ़ी साहिब गुरुद्वारे में निशान साहिब स्थापित कर सिखों को राजनीतिक शक्ति का संदेश दिया था। कच्चा किला क्षेत्र में आज भी उनसे जुड़े कई ऐतिहासिक अवशेष मौजूद हैं।
साढौरा की ऐतिहासिक धरोहरें हमारी सबसे बड़ी पहचान हैं। इनके संरक्षण और पर्यटन विकास से क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी। प्रशासन और समाज को मिलकर इन्हें सुरक्षित रखना चाहिए। - पंकज चुघ।
साढौरा में हर धर्म की विरासत मौजूद है। यह सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। सरकार को इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए विशेष योजना बनानी चाहिए। - पार्षद सजल सेठ।
हमारी पीढ़ियां इन धरोहरों के बीच पली-बढ़ी हैं। यह केवल इमारतें नहीं बल्कि हमारी संस्कृति और परंपराओं की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना सभी की जिम्मेदारी है। - शिव देवी वर्मा।
यदि ऐतिहासिक स्थलों का बेहतर प्रचार-प्रसार और संरक्षण हो तो साढौरा धार्मिक और विरासत पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। - सुधीर भल्ला।
प्राचीन मंदिर, दरगाह, गुरुद्वारा और मस्जिदें साढौरा की साझा संस्कृति का प्रतीक हैं। इन धरोहरों को बचाना हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। - सूरज ओबेराय
साढौरा का गौरवशाली इतिहास युवाओं तक पहुंचना चाहिए। विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें। - वरुण अग्रवाल।
तोरोवाला तालाब के तट पर बना प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर। संवाद
तोरोवाला तालाब के तट पर बना प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर। संवाद
तोरोवाला तालाब के तट पर बना प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर। संवाद