संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के 43वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि जैन परंपरा अनुसार अब जैन धर्म के महापर्व पर्यूषण आरंभ हो रहे हैं। पर्व दो प्रकार के होते हैं, लौकिक व लोकोत्तर। लौकिक पर्व मौज मस्ती करने के होते हैं, जिनमें कर्म बंध होता है। जो पर्व आत्मा का कल्याण करते हैं व कर्मों की निर्जरा करते हैं, वह लोकोत्तर पर्व कहलाते हैं।
पर्यूषण महापर्व लोकोत्तर पर है। यह पर्व हमें तप, त्याग, तपस्या, क्षमता में रहना सिखाते हैं। यह पर्व आठ दिनों तक मनाए जाते हैं। इन आठ दिनों में अधिक से अधिक जपतप, दान पुण्य, धर्म, ध्यान करना होता है। पर्यूषण पर्व जैन धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार है, जो जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों में से एक अहिंसा व आत्म शुद्धि की महत्ता को दर्शाता है। पर्यूषण पर्व का अर्थ है कि आत्म शुद्धि का पर्व।
यह पर्व जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता है, जो अपने जीवन में अहिंसा व आत्म शुद्धि को महत्व देते हैं। पर्यूषण पर्व जैन धर्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पर्व जैन समुदाय को अपने जीवन में अहिंसा और आत्म शुद्धि को महत्व देने की याद दिलाता है। यह पर्व जैन समुदाय को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करता है।