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डेंगू बेकाबू, प्लेटलेट्स के लिए हाहाकार

Tue, 24 Sep 2013 12:55 AM IST
यमुनानगर।
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सिविल अस्पताल में डेंगू के संदिग्ध मरीजों की लाइन नहीं थम रही है, वहीं प्लेटलेट्स के लिए भी हाहाकार मचा है। ब्लड बैंक के कर्मचारी भी मान रहे हैं कि प्लेटलेट्स की डिमांड कई गुणा बढ़ गई है, लेकिन सप्लाई इससे कम है। जल्द ही अगर हालात काबू नहीं आए तो स्थिति ओर बिगड़ सकती है।
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सोमवार को ट्रामा सेंटर के ब्लड बैंक में प्लेटलेट्स पूरी तरह से खत्म थे। संदिग्ध डेंगू से पीड़ित बैंक कॉलोनी के मोतिबाग निवासी प्रवीन सिविल अस्पताल पहुंचे। उन्होंने बताया कि प्राइवेट लैबोरेटरी से उन्होंने रक्त की जांच कराई, तो उसमें उसके प्लेटलेट्स 50 हजार आए। प्लेटलेट्स को पूरा करने के लिए जब वह दोपहर करीब एक बजे ट्रामा सेंटर पहुंचे। ब्लड बैंक में प्लेटलेट्स के बारे में पूछा, तो ब्लड बैंक में प्लेटलेट्स नहीं मिले। उन्होंने पीजीआई या अन्य अस्पताल में जाने की असमर्थता बताई तो डॉक्टर ने उन्हें एक दिन का इंतजार करने की बात कही।

चार दिन से बीमार हूं
ट्रामा सेंटर पहुंचे डेंगू के संदिग्ध मरीज प्रवीन ने बताया कि वह चार दिन से बीमार हैं। पहले आसपास के डॉक्टरों से दवा लेते रहे। डॉक्टरों ने रक्त की जांच कराने की बात कही। प्रवीन ने बताया कि सोमवार सुबह ही उसने निजी लैबोरेटरी से रक्त की जांच कराई, तो उन्होंने डेंगू के लक्षण बताए और रिपोर्ट में प्लेटलेट्स 50 हजार आए।  
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ये है प्लेटलेट्स
डॉक्टरों के मुताबिक लाल और सफेद रक्त कणिकाओं की तरह प्लेटलेट्स भी रक्त का हिस्सा होते हैं। इसे कृत्रिम तरीके से नहीं बनाया जा सकता। यह खून से ही निकाला जाता है। इसका मुख्य काम खून में गाढ़ापन बनाए रखना है। इससे ब्लीडिंग न हो। खून में 1.5 से 4 लाख के बीच प्लेटलेट्स होना सामान्य है। अगर प्लेटलेट्स 20 हजार से कम हो जाए, तो हाथ, मुंह, नाक और पेट के अंदर रक्त स्राव हो सकता है।

प्लेटलेट्स देने के तरीके
रेेंडम डोनर में मरीज को उसके ब्लड ग्रुप का प्लेटलेट्स दे दिया जाता है। इसके बदले में ब्लड बैंक को किसी भी ब्लड ग्रुप वाले डोनर से रक्तदान करना पड़ता है। रक्त से प्लेटलेट्स निकालने के लिए पहले मशीन में प्रोसेसिंग की जाती है। सबसे पहले इसमें से पैक्ट रेड सेल्स अलग किए जाते हैं। छह घंटे में इसमें से फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा अलग किया जाता है। इसके बाद प्लाज्मा और फिर प्लेटलेट्स बनता है।

रोमन डोनर
रोमन डोनर तकनीक में डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप सामने होना जरूरी है। इसमें सिर्फ डोनर के शरीर से सिर्फ प्लेटलेट्स निकाले जाते हैं। डोनर के शरीर से ब्लड प्लेटलेट्स मशीन से गुजारा जाता है। वहां से प्लेटलेट्स अलग होकर मरीज के शरीर में चले जाते हैं। हालांकि यह तकनीक काफी महंगी है जो ट्रामा सेंटर में नहीं है।  
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