संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। खंड रादौर के दामला गांव में तीन ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर स्थापित हैं। इन मंदिरों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज चैप्टर के सह संयोजक सिद्धार्थ गौरी ने मांग उठाई है। इसके लिए उन्होंने हरियाणा पुरातत्व विभाग को पत्र लिखा है।
उन्होंने पत्र में लिखा है इन प्राचीन मंदिरों का संरक्षण करने से लोगों की आस्था भी बढ़ेगी। उनका दावा है इन मंदिरों का संबंध पुरानी यमुना के तट पर वैदिक काल से चला आ रहा है। लगभग 11 वीं 12 वीं शताब्दी में चौहान राजाओं के परिवार के सदस्यों का सरस्वती और यमुना के पूजन का वर्णन मिलता है। यह मंदिर उसी काल करम के तहत चलते आ रहे हैं। शोधकर्ता गौरी के अनुसार सरस्वती, दृषद्वती के साथ रादौर ब्लाॅक में यमुना नदी प्राचीन काल से तीर्थों के रूप में पूज्य जाते थे।
शोधकर्ता सिद्धार्थ गौरी का कहना है शिवालिक से दिल्ली तक प्रदेश में ये एक मात्र यमुना तट पर इतने भव्य मंदिर बचे हैं। पुरातात्विक खोज के अनुसार तीनों प्राचीन मंदिर इतिहासकारों और संरक्षणवादियों की समान रुचि को आकर्षित कर रहे हैं तथा पुरानी (बड़ी) यमुना नदी के ऐतिहासिक तल के पास स्थित मंदिरों की चोटी लखौरी ईंट से निर्मित व चूना पत्थर पाउडर प्लास्टर की परत के साथ निर्मित है। इतना ही नहीं इनकी संरचनाएं न केवल मजबूत है, बल्कि इनकी छतों पर जटिल चित्रकारी भी की गई है । जिस जगह पर ये मंदिर स्थापित हैं यमुना के इस भाग को कालिंदी कहा जाता था।
जिले में ये भी अमूल्य धरोहरें
जिले के टोपरा कलां, सुघ, चनेटी व संधाय में कई प्रकार की ऐतिहासिक प्राचीन अमूल्य धरोहर हैं। इनमें 2500 साल पहले सम्राट अशोक यमुनानगर खंड रादौर के गांव टोपरा कलां से तोड़ कर दिल्ली लेकर आया था। जोकि वर्तमान में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला पार्क वही अशोक स्तंभ पर गढ़ा हुआ है, वहीं गांव चनेटी के करीब 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में ईंटों से बने से 8 मीटर की ऊंचाई वाला एक विशाल मकबरा है। गोल आकार में बना, यह एक पुराना बौद्ध स्तूप है। इसी तरह सुघ गांव में प्राचीन टीला, जिसे सुघ के प्राचीन स्थल के रूप में भी जाना जाता है, यमुनानगर जिले के अमादलपुर दयालगढ़ गांव में स्थित है। इन सभी पर भी सिद्धार्थ गौरी शोध कर चुके हैं।