Delhi had arrived from Pakistan while hiding from the massacre, spent many years in tents
- फोटो : Yamuna Nagar
यमुनानगर। तब मेरी उम्र करीब 21 साल थी। उस वक्त हम पाकिस्तान के गुजरात में रहते थे। मैं कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहा था। पिता जी बहुत बड़े वकील थे। तब घर नहीं बल्कि हमारी बहुत बड़ी हवेली थी। हमारे घर के आसपास लगभग सभी समुदायों के लोग रहते थे। मुस्लिम समुदायों के लोगों के साथ पारिवारिक संबंध थे। तब कोई एक दूसरे से किसी तरह की हीन भावना नहीं रखता था फिर अचानक घोषणा हुई कि भारत से अलग होकर पाकिस्तान नया देश बन रहा है। इसलिए जो जिस देश (भारत या पाकिस्तान) में रहना चाहता है, वहां चला जाए। देश के बंटवारे के समय हुए कत्लेआम को भी देखा। उस घटना को याद करके आज भी मॉडल टाउन निवासी 96 वर्षीय महाराज कृष्ण पुरी सिहर जाते हैं।
महाराजा कृष्ण पुरी ने बताया कि जब बंटवारे के बारे में सुना था तो यह सोचने का भी समय नहीं मिला था कि भारत जाएं या पाकिस्तान। तब ज्यादातर हिंदू व सिख भारत की सीमा की तरफ दौड़ रहे थे। तब उनके परिवार को भी अपनी जमीन, जायदाद छोड़कर भारत के लिए रवाना होना पड़ा। उसी समय शरारती लोगों ने मारकाट शुरू कर दी थी। छिपते-छिपाते उनका परिवार गुजरात के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा। वहां पर जो रेलगाड़ियां आती थी उनमें लोगों की लाशें पड़ी होती थी। फिर वह दिल्ली पहुंचे। जहां पर करीब छह महीने तक रहे। परिवार का गुजारा करने के लिए काम की जरूरत थी इसलिए पिता एडवोकेट प्रताप चंद परिवार को लेकर यमुनानगर (तब अब्दुल्लापुर) के मॉडल टाउन में आ गए। महाराज कृष्ण पुरी ने बताया कि बंटवारे से पहले वह शान से जिंदगी जी रहे थे, लेकिन वहां से आकर उन्हें टेंटों में रिफ्यूजी बनकर रहना पड़ा। जब धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी तो उन्होंने कॉलेज से ऑटोमोबाइल में इंजीनियरिंग की।
हर किसी के हाथ में तिरंगा देख अच्छा लगता है
महाराज कृष्ण पुरी के बेटे गिरीश पुरी का कहना है कि पिता पुरानी बातों का जिक्र परिवार के साथ अक्सर करते रहते हैं। वह कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय से जो प्यार आजादी के समय था वह आज तक उसे नहीं भूले हैं। इतनी कठिनाइयां झेलने के बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया बनेगा। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। आज भी जब भ्रष्टाचार के बारे में सुनते हैं या अखबार में पढ़ते हैं तो वह काफी दुखी हो जाते हैं। क्योंकि भ्रष्टाचार देश को खोखला करता है। महाराज कृष्ण पुरी ने बताया कि देशभक्ति का जो जज्बा वह इस बार लोगों में देख रहे हैं वैसा आज तक कभी नहीं देखा। बच्चे हों या बड़े हर किसी के हाथ में तिरंगा देखकर अच्छा लगता है।