संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र और हिंदी नववर्ष पर वीरवार को लोगों में भारी उत्साह देखने को मिला। विक्रम संवत्सर 2083 और नवरात्र का पहला दिन होने के कारण दिनभर मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रही। भोर में कपाट खुलते ही मंदिरों में भक्तों का तांता लगने लगा। पहले दिन माता के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा हुई।
नवसंवत्सर के शुभारंभ पर मंदिरों वैदिक अनुष्ठान किए गए। पहले दिन घरों व प्रतिष्ठानों पर भक्तों ने घट स्थापना कर मां की उपासना का व्रत लिया। नवरात्र पर मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया गया है। वीरवार तड़के मंदिरों के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए गए। शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों के मंदिरों में भीड़ देखने को मिली।
भक्तों ने मंदिरों में पहुंच कर मां की पूजा कर मनोकामनाएं मांगी। इस दौरान जगाधरी के देवी भवन मंदिर और रेलवे स्टेशन स्थित श्री मूर्ति देवी मंदिर में सबसे ज्यादा भीड़ रही। मंदिरों में रात तक श्रद्धालुओं का आना जारी रहा। भक्तों ने घरों, कार्यालय, प्रतिष्ठानों में घट स्थापना कर मां दुर्गा की नौ दिन आराधना का संकल्प लिया।
श्रद्धालुओं ने घट स्थापना के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की। पूजन के साथ श्रद्धालुओं ने व्रत धारण किया। व्रत करने वाले श्रद्धालु नौ दिन मां दुर्गा के नव रूपों की पूजा करेंगे। वहीं, अष्टमी व नवमी पर कन्या पूजन व भोज के साथ व्रत पूर्ण करेंगे। इसे लेकर लोगों में भारी उत्साह देखने को मिला।
नवरात्र व नववर्ष के चलते जिले के प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर पातालेश्वर महादेव मंदिर, कालेश्वर महादेव मठ मंदिर, भंभौली स्थित स्वयं-भू महादेव मंदिर, आदिबद्री केदारनाथ मंदिर, अमादलपुर स्थित सूर्यकुंड मंदिर में भारी भीड़ रही। ज्योतिषाचार्य पंडित रमन वत्स ने बताया कि दूसरे नवरात्र पर माता के द्वितीय रूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बहुत ही ममता व करुणामयी है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से साधक श्रेष्ठ व्यक्तित्व को प्राप्त करता है। चूंकि ब्रह्मचारिणी तप व भक्ति की देवी हैं। उन्होंने बताया कि मां ब्रह्मचारिणी के नाम में ही उनकी शक्तियों की महिमा का वर्णन मिलता है। ब्रह्म का अर्थ तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली है। अर्थात तप का आचरण करने वाली शक्ति है।
मां के इस स्वरूप की पूजा करने से तप, त्याग, संयम, सदाचार में वृद्धि होती है। जीवन के कठिन से कठिन समय में भी मनुष्य अपने पथ से विचलित नहीं होता है। मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिपटी कन्या के रूप में है, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे में कमंडल है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी शास्त्रों के ज्ञान व तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त हैं।