इलाज में लापरवाही की वजह से मरीज की अंगुली काटनी पड़ी। जिस पर मरीज को राहत का हकदार मानते हुए जिला उपभोक्ता फोरम ने 20 हजार रुपये मुआवजा व पांच हजार रुपये कानूनी खर्च के देने के आदेश दिए है। डाक्टर की ओर से यह मुआवजा इंश्योरेंस कंपनी 30 दिन में देगी। देरी होने पर मुआवजा छह प्रतिशत ब्याज के साथ दिया जाएगा।
बिलासपुर की हरिजन बस्ती निवासी सचिन कुमार ने उपभोक्ता फोरम में याचिका दायर की। जिसमें उसने बताया कि 20 दिसंबर 2010 को उसके हाथ की अंगुली में चोट लग गई। वह तुरंत कस्बा स्थित गुप्ता अस्पताल में गया और जहां डा. कुलभूषण गुप्ता ने इलाज शुरू कर दिया। डाक्टर ने अंगुली में तीन टांके लगाए और कुछ दवाइयां लिख कर दी। कुछ दिन डाक्टर से दुबारा मिला और बताया कि उसे कोई राहत नहीं है। इसके बाद वह कई बार डाक्टर के पास गया और बताया कि उसकी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। लेकिन डाक्टर ने जल्द ही जख्म ठीक होने का आश्वासन दिया। छह फरवरी 2011 को डाक्टर ने अंगुली का इलाज करने से इंकार कर दिया। जिसके बाद अगले दिन उन्होंने अंबाला रोड स्थित विघ्नेश अस्पताल में डाक्टर से संपर्क किया। जहां डाक्टर ने चैक करके बताया कि अंगुली में टांके ठीक नहीं लगाए और कम से कम छह टांके लगाए जाने चाहिए थे। अब अंगुली में गैंगरिन हो गया और इसका इलाज संभव नहीं है। उनके पास अंगुली को काटने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। इसलिए उसने अपनी अंगुली को कटवना पड़ा। मरीज ने बताया कि डाक्टर की लापरवाही व सही इलाज न होने की वजह से उसकी एक अंगुली काटनी पड़ी। इससे उसे मानसिक परेशानी उठानी पड़ी और उसके काम का भी नुकसान हो रहा है। उपभोक्ता ने फोरम में डाक्टर से 80 हजार रुपये का मुआवजा व कानूनी खर्च देने की मांग की।
इसके जवाब में डाक्टर ने फोरम में अपना लिखित पक्ष रखा। जिसमें बताया कि इलाज में किसी तरह की कोई लापरवाही नहीं की गई। मरीज को बेस्ट इलाज दिया गया था। मरीज की ओर से ही लापरवाही की गई है। डाक्टर ने बताया कि डिस्चार्ज होने के बाद मरीज करीब डेढ़ महीने बाद अस्पताल में आया। इस दौरान उसे लोकल बंगाली डाक्टर से इलाज करवाया, जिसकी वजह से अंगुली में गैंगरिन हो गया। ऐसे में उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं, बल्कि मरीज के स्तर पर लापरवाही हुई है।
दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद फोरम के अध्यक्ष अशोक कुमार गर्ग व सदस्य एससी शर्मा ने माना कि डाक्टर के गलत इलाज की वजह से मरीज को अपनी अंगुली खोनी पड़ी। इसलिए मरीज राहत का हकदार है। जिस पर उन्होंने उपरोक्त निर्णय सुनाया।