संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। टीबी मरीजों के लिए दवा खरीद घोटाले के आरोपों में घिरे सिविल सर्जन डॉ. मंजीत सिंह को तीन डिप्टी सिविल सर्जन की टीम ने अपनी क्लीन चिट दे दी। वहीं विजिलेंस की जांच अभी जारी है। शिकायतकर्ता ने सोमवार को विजिलेंस के सामने प्रस्तुत होकर अपने बयान दर्ज कराए हैं।
शांति कॉलोनी निवासी बलविंद्र सिंह ने उनके खिलाफ सीएम विंडो के अलावा विजिलेंस को शिकायत देते हुए दवा खरीद में 18 लाख 50 हजार रुपये का घोटाला करने के आरोप लगाए थे। मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग ने डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. दिव्या मंगला, डॉ. सुशीला सैनी व डॉ. संजय राठी की टीम का गठन किया था। तीनों ने इस मामले की जांच की।
तीनों ने ही यह कहते हुए क्लीन चिट दे दी कि टीबी मरीजों के लिए दवाई नियमानुसार ही खरीदी गई थी। स्क्रीनिंग में टीबी के मरीज ज्यादा संख्या में मिले थे। इसलिए दवा खरीद से पहले स्टेट टीबी ऑफिसर डॉ. हितेश वर्मा से स्वीकृति ली गई। कुल 14 प्रकार की दवाइयों की खरीद की गई थी। इसलिए डॉ. मंजीत ने इसमें कोई घोटाला नहीं किया है।
तीन डॉक्टरों की टीम ने मामले की जाे जांच की है उसमें शिकायतकर्ता शामिल नहीं हुए। हालांकि बलविंद्र सिंह का कहना है कि उन्हें डॉ. दिव्या मंगला का फोन आया था। परंतु उन्होंने जांच में शामिल होने से मना कर दिया, क्योंकि पता नहीं वह उल्टा उन्हीं पर कोई आरोप लगा दें। उसने सीएम विंडो पर शिकायत दी है। इसलिए जांच टीम को जो रिपोर्ट देनी है वह जमा करवा दे। जांच में जो आया है वह उसे बता दे। बलविंद्र सिंह का कहना है कि सिविल सर्जन डॉ. मंजीत सिंह पर ही घोटाले का आरोप है और वही अपनी जांच करने के लिए खुद कमेटी बना रहे हैं। इसलिए जांच निष्पक्ष कैसे हो सकती है।
यह लगाया था आरोप
बलविंद्र सिंह की शिकायत में आरोप लगाया है कि जिले के टीबी मरीजों के लिए सरकारी दवाइयां होने के बावजूद बिना अनुमति बाहर से करीब 18.50 लाख रुपये की दवाइयां खरीदी गई। अगले दिन स्टेट की ओर से भी टीबी की दवाइयां भेज दी गई। इसमें घोटाला करते हुए सरकारी रिकॉर्ड में सारी दवाइयों की खपत दिखा दी गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि जिले में इतने टीबी के मरीज नहीं हैं, जितने की दवाइयों की खपत दिखाई गई। बलविंद्र सिंह ने शिकायत में इसका आरोप सिविल सर्जन मनजीत सिंह पर लगाया है।
टीबी मरीजों के लिए दवा की खरीद में कोई घोटाला नहीं हुआ है। खरीद से पहले सारी औपचारिकताओं को पूरा किया गया। पहले कोटेशन ली गई। स्टेट टीबी ऑफिसर से मंजूरी लेकर दवा खरीदी गई। इसलिए सिविल सर्जन का इसमें कोई दोष नहीं है। - डॉ. दिव्या मंगला, डिप्टी सिविल सर्जन, यमुनानगर।