निरंजन कुमार राणा
यमुनानगर।....था तुझे गुरूर खुद के लंबे होने का ऐ सड़क, गरीबों के हौसलों ने तुझे पैदल ही नाप दिया। ये जिंदगी की बेचारगी है, लेकिन उस पर प्रवासी मजदूरों का हौसला भारी है। भरी दोपहरी 40 डिग्री तापमान के बीच तपती सड़क पर सैकड़ों की संख्या में प्रवासी मजदूर यमुनानगर होकर अपने मासूम बच्चों के साथ जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं। नेशनल हाईवे नंबर 344 पर सिर्फ प्रवासी मजदूरों का रेला है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। कोई मजदूर कंधे पर बच्चे को बिठाए है तो कोई मां अपने लाल को गोदी में और कोई गृहस्थी का सामान भी सिर पर लिए हैं।
सुबह से शाम तक कई हजार लोग गुजर रहे हैं। ये सभी पंजाब, हिमाचल और राजस्थान से आ रहे हैं। किसी को बिहार जाना है तो किसी को पूर्वी उत्तर प्रदेश। मंजिल दूर है, वाहन है नहीं, मगर जज्बा है कि पैदल ही चले जा रहे हैं। भूखे प्यासे ये लोग ना पैरों के छाले देख रहे और न तपती धूप।
गर्भवती महिलाएं और बच्चे भी
यूपी बॉर्डर पर भयावह चौंका देने वाला मंजर देखने को मिला है। यहां पूर्वी यूपी, बिहार, बंगाल जाने वाले सैकड़ों मजदूर फंसे हुए हैं। लॉकडाउन की मार के चलते ये मजबूर मजदूर बेबस, बदहाल खुले आसमान के नीचे आराम करने को मजबूर हैं। आंधी तूफान में कहीं इनको ठिकाना नहीं हैं। इनमें प्रवासियों में कई गर्भवती महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, जो भूख-प्यास से बेहाल अकेली राहों में चल रहे हैं। परिवार के साथ लुधियाना से गोरखपुर जा रहे सात साल के सचिन ने बताया कि अंकल मैं दूसरी क्लास में पढ़ता हूं, अब स्कूल में फीस मांगते हैं, पापा को फैक्टरी वाले ने पैसे नहीं दिएं। अब अपने गांव जाकर पढ़ना है। पैदल चलकर पांव सूज गए हैं, उसका छोटा भाई वैभव भी है। थक जाने पर वैभव को उसका पिता पप्पू गोद में उठा लेता है, लेकिन उसे पैदल ही चलना पड़ता है।
साहब! हमारा बस एक कसूर है कि हम गरीब हैं
-बिहार के रहने वाले अवधेश, निर्मला, चंद्रभान, राजेंद्र, मधु सूदन आदि ने अमर उजाला से अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि हमारी गलती ये है कि हम गरीब हैं। आखिर ऐसा क्या करें कि कोई हमारा दुख समझे और हमें हमारे घर बिहार ले जाएं। सरकार चाहे जो कहे कि वो हमारे लिए कर रही है, सच यही है कि हम सड़कों पर हैं, भीख मांग रहे हैं कि हमें घर जाने में मदद करें। पुलिस भी हमारी सहायता नहीं कर रही। कम से कम हमारा रास्ता ना रोकें और हमें घर जाने दें।
असम के रहने वाले संतोष अमृतसर की एक फैक्टरी में काम करते थे। लॉकडाउन हुआ तो पैदल ही दो हजार किलोमीटर दूर घर जाने निकल पड़े। उसकी कहानी बेहद दर्दनाक है। पैदल चलते-चलते उन्होंने सिर्फ पानी पीया, खाने को कुछ नहीं मिला। शाम को किसी ने उसका सामान चोरी कर लिया। उसमें बचत के 2,000 रुपयों के अलावा पैन, आधार कार्ड, मोबाइल बैग था जो चला गया। अब वह भगवान भरोसे चला जा रहा है।
बेबस आंखों में संजोई उम्मीदें
-लुधियाना से सीतापुर जा रही पदमा तीन महीने से गर्भवती है। पति शंभू के साथ तीन साल के बेटे को कंधे पर बैठाकर सीतापुर के निकली है। उसने बताया कि पति फैक्टरी में मजदूरी करते थे, लेकिन लॉक डाउन में नौकरी छूट गई। जो बचा खुचा था, उससे कुछ दिन गुजारा किया। घर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन भी करवाया, लेकिन बात नहीं बनी। अब भूखे मरने की नौबत आई तो गांव की तरफ निकल लिए। तीन साल के बेटा ज्यादा पैदल नहीं चल सकता। पति सामान उठाता है तो वह बेटे को कंधे पर बैठाती है। रास्ते में किसी ने कुछ दे दिया तो खा लिया, जहां पानी मिला वहां पी लिया। उन्होंने कहा कि साहब हम बेबस हैं, लेकिन किसी तरह जिंदा घर लौट जाएं।
civic- फोटो : Yamuna Nagar