संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। मॉडल टाउन के एसएस जैन सभा के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम का वीरवार को आठवां दिन रहा। इस दौरान साध्वी सुचेता महाराज ने कहा जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है उसी तरह आत्मा के लिए भजन जरूरी है। यदि हम शरीर के जिंदा रहने के लिए भोजन दिन में तीन बार करते हैं तो उसकी तुलना में भजन जो आत्मा को तृप्त करता है, वो नहीं करते हैं।
उन्होंने बताया कि भजन 84 करोड़ योनियों में भटकने से मुक्ति दिलवाता है। भजन के लिए समय का होना जरूरी है। समय के लिए श्रद्धा व श्रद्धा के लिए सच्ची भावना का होना जरूरी है। तीन बार भोजन भजन एक बार है उसमें भी झंझट हजार हैं। साध्वी ने उत्तरायण के 24 में सूत्र की व्याख्या की और बताया कि धर्म की माता हमेशा ज्ञान देती है और चोटों से बचाती है।
प्राणी मात्र को पाप करने से बचना चाहिए, चूंकि किया पाप भोगना जरूर पड़ता है। उसे भोगे बिना किसी भी प्रकार से मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसीलिए धर्म ध्यान के रास्ते पर बढ़कर पापों से मुक्ति पाने का उपाय खोजना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भारूंड नाम का पक्षी जो आगे भी देखता है और पीछे भी, ताकि दोनों तरफ से किसी भी प्रकार के अनिष्ट की आशंका से बचा जा सके। इसी प्रकार मनुष्य को कर्म करते हुए चारों तरफ ध्यान रखना चाहिए कि उसके हाथों कोई भी अनिष्ट न हो।
उन्होंने आठ प्रकार के मद का वर्णन किया। कहा कि मद आठ हैं, मैं ज्ञानवान हूं, सकल शास्त्रों का ज्ञाता हूं यह ज्ञानमद है। मैं सर्वमान्य हूं, राजा-महाराजा मेरी सेवा करते हैं यह पूजा आज्ञा या प्रतिष्ठा का मद है। मेरा पितृपक्ष अतीव उज्ज्वल हैं, उसमें ब्रह्महत्या या ऋषि हत्या इत्यादि का दूषण कभी नहीं लगा है यह कुलमद है। मेरी माता का पक्ष बहुत ऊंचा है, वह संघपति की पुत्री हैं शील में सुलोचना, सीता, अनंतमति व चंदना इत्यादि सरीखी हैं, यह जातिमद है।
मैं सहस्रघट, लक्षभट, कोटिभट हूं यह बलमद है। मेरे पास अरबों रुपये की संपत्ति थी, वह सब छोड़कर मैं मुनि हुआ हूं, अन्य मुनियों ने अधर्मी होकर दीक्षा ग्रहण की है। यह ऋद्धि या ऐश्वर्य मद है। विमान पंक्ति, सर्वतोभद्र आदि महातपों की विधि का विधाता हूं। मेरा पूरा जीवन तप करते-करते गया है। ये सर्व मुनि तो नित्य भोजन में रत रहते हैं, यह तप मद है। मेरे रूप के सामने कामदेव भी दासता करता है यह रूपमद है।