संवाद न्यूज एजेंसी
साढौरा। सुदामा चरित्र प्रसंग सच्ची मित्रता बिना स्वार्थ बराबरी या गरीबी न देखना ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण और विपरीत परिस्थितियों में भी संतोष रखने की शिक्षा देता है। यह प्रसंग सिखाता है कि सच्चा मित्र धन नहीं बल्कि प्रेम व सम्मान देखता है।
यह पंक्तियां श्रीश्याम गोशाला में चल रही कथा के अंतिम दिन मथुरा की साध्वी प्रिया किशोरी ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहीं।
उन्होंने बताया कि कृष्ण और सुदामा की कहानी सिखाती है कि दोस्ती में अमीर-गरीब का भेद नहीं होना चाहिए। श्रीकृष्ण ने राजा होकर भी एक निर्धन मित्र सुदामा का भव्य स्वागत किया। ईश्वर केवल प्रेम व समर्पण के भूखे होते हैं। सुदामा के प्रेमपूर्वक लाए गए मुट्ठी भर चावल को कृष्ण ने बड़े चाव से खाया जो सादगी और निस्वार्थ भक्ति दर्शाता है।
सुदामा ने द्वारका जाकर कृष्ण से कुछ नहीं मांगा फिर भी उन्हें सब कुछ मिला। यह सिखाता है कि यदि आप समर्पित हैं तो ईश्वर बिना मांगे ही आपकी आवश्यकताएं पूरी कर देते हैं। घोर दरिद्रता में भी सुदामा ने अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी और न ही कोई शिकायत की, जो विपत्ति में धीरज व निष्ठा की सीख देता है।
साध्वी प्रिया ने बताया कि परीक्षित मोक्ष और शुकदेव की विदाई का प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण का सबसे भावपूर्ण और ज्ञानवर्धक प्रसंग है। यह कथा बताती है कि जीवन के अंत समय में ज्ञान वैराग्य और भक्ति का सर्वोच्च शिखर है।
परीक्षित को सात दिन में मृत्यु का श्राप मिला था, जिससे वह भयभीत नहीं बल्कि सचेत हुए। शिक्षा यह है कि मृत्यु अटल है इसलिए मृत्यु से डरने के बजाय उसके लिए तैयार रहना चाहिए। जब मन भगवान में लग जाता है तो मृत्यु का भय स्वतः समाप्त हो जाता है। शुकदेव ने परीक्षित को समझाया कि सात दिन में मुक्ति केवल नारायण के स्मरण व कथा श्रवण से ही संभव है। गौरक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष महामंडलेश्वर विश्वमित्रानंद ने आरती की।