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प्रदूषण का साइड इफेक्ट-जिले में बढ़ी टीबी के मरीजों की संख्या, एक साल में 2

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प्रदूषण का साइड इफेक्ट-
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जिले में बढ़ रही टीबी के मरीजों की संख्या, एक साल में 2800 केस सामने आएं
-रोजाना 15 ओपीडी, स्वास्थ्य विभाग चिंतित
-पिछले साल 2800 टीबी के केस आए सामने, इस साल आए 30 केस सामने
-मरीज को पौष्टिक आहार के लिए प्रतिमाह मिलते हैं 500 रुपये
-आधे से ज्यादा पेशेंट करने पड़ते हैं पीजीआई चंडीगढ़ रेफर।
अमर उजाला ब्यूरो
यमुनानगर।
ट्विनसिटी में मेटल और प्लाइवुड इंडस्ट्री की वजह से प्रदूषण खतरनाक लेवल पर है। जिसके साइड इफेक्ट भी सामने आने लगे हैं। प्रदूषण के चलते जिले में टीबी लगातार पांव पसार रही है और इस बीमारी से ग्रस्त मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग से मिले आंकड़े भी चौकाने वाले हैं। विभाग के मुताबिक रोजाना 15 टीबी मरीज आ रहे हैं। पिछले साल 2800 मरीज टीबी के मिले। जबकि इस साल की शुरूआत में अभी तक 30 कंफर्म मरीज सामने आ चुके हैं। उधर, टीबी के मरीजों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य विभाग भी टेंशन में आ गया। विभाग ने इस बीमारी के प्रति जागरूकता के लिए तीन टीमों का गठन भी किया है।
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दिए जाते हैं 500 रुपये
टीबी (क्षय रोग) के मरीजों को पौष्टिक आहार के लिए प्रतिमाह 500 सौ रुपये की राशि दी जाती है। यह राशि केंद्रीय योजना मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर की ओर से निक्षय पोषण योजना के तहत दी जाती है। यह राशि मरीजों को पौष्टिक आहार लेने में आ रही आर्थिक तंगी से राहत देने के लिए चलाई गई है।
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3 कैटेगरी में रख कर किया जाता है इलाज
-सीबीनॉट मशीन से मरीजों की बलगम जांच कर टीबी के रोगी की पहचान की जाती है। जिसमें वर्गीकरण कर मरीजों को तीन कैटेगरी में रखा गया है। पीसीवन मरीजों को 6 महीने की दवा चलाई जाती है। जबकि पीसीटू में 8 माह की दवा का डोज दिया जाता है। डॉक्टरों के सलाह लिए बिना समय से पहले दवा छोडऩे पर अधूरा इलाज होने की वजह से तीसरी कैटेगरी एमडीआर व एक्सडीआर के मरीजों को 27 माह की दवा का डोज दिया जाता है।
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टीबी के निवारण का तरीका
टीबी एक संक्रामक रोग है। इसमें फेफड़ों में इनफेक्शन हो जाता है। कमजोरी आना, दो हफ्ते से ज्यादा खांसी होना और बुखार आना इस बिमारी के लक्षण हैं। टीबी शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। एब्डॉमन, किडनी, स्पाइन, ब्रेन या शरीर के किसी भी अंग की हड्डी में टीबी हो सकता है
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टीबी होने के कारण
चिक्त्सिकों के अनुसर साफ-सफाई नहीं रखना या मदिरापान, धूम्रपान करना टीबी इन्फेक्शन का कारण हो सकता है, शरीर में पोषण की कमी व लंबे समय तक जंक फूड के इस्तेमाल से टीबी के बैक्टेरिया अटैक कर सकते हैं, मीजल्स,न्यूमोनिया और एचआईवी पॉजिटिव होना भी टी.बी का कारण हो सकता है, गाय का कच्चा दूध पीने से टीबी होने की संभावना बढ़ जाती है, रोगी के सम्पर्क में रहने या उसकी वस्तुओं का उपयोग करने से भी रोग होता है, गलती से रोगी का खून अन्य किसी रोगी के शरीर में चढ़ाने से वह व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है।
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इस तरह से बचा जा सकता है टीबी से
चिकित्सकों के अनुसार दो हफ्तों से अधिक समय तक खांसी रहती है, तो चिकित्सक को दिखाएं, आस-पास कोई बहुत देर तक खांस रहा है, तो उससे दूर रहें , किसी बीमार व्याक्ति से मिलकर आ रहे हैं तो अपने हाथों को जरूर धो लें, पौष्टिक आहार लें जिसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन्स, मिनेरल्स, कैल्शियम, प्रोटीन और फाइबर हों क्योंकि पौष्टिक आहार हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है, अधिक समय से खांसी है,तो बलगम की जांच जरूर करा लें, खांसी या जुकाम होने पर अपनी ही रूमाल का इस्तेमाल करें।
वर्जन
टीबी के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। रोजाना 10 से 15 केस सामने आ रहे हैं। पिछले साल 2800 केस सामने आए हैं। बीमारी का सावधानी ही उपाय है और इसका इलाज भी संभव है। लोगों को जागरूक करने के लिए टीमों का गठन भी किया गया है जो अलग-अलग एरिया में कार्य कर रही है।
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-डॉ. अनूप गोयल, डिप्टी सीएमओ एवं टीबी स्पेशलिस्ट।
-प्रदूषण के कारण टीबी का खतरा 2-3 गुना बढ़ जाता है। प्रदूषण से सिलकोसिस रोग का खतरा 30 गुना होता है और सिलकोसिस रोग टीबी का एक बड़ा कारण है। वातावरण में पीएम 2.5, नाइड्रोजन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से टीबी होने का खतरा ज्यादा है। ऐसे में अगर प्रदूषण पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है।-डॉ. कुलदीप सिंह, सीएमओ
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