पढ़ने का जुनून : कूड़े के ढेर में भविष्य तलाशती मुस्कान
- स्कूल जाने से पहले एक घंटा और स्कूल से आने के बाद तीन घंटे कूड़ा बीन कर चंद रुपये कमाती है मुस्कान
- इन रुपयों से कॉपी किताब, ड्रेस और अन्य खर्च निकालना बना दिनचर्या
- ये कहानी है तीसरी क्लास में पढ़ने वाली मुस्कान की, बचपन में ही माता-पिता की हो गई मौत
अमर उजाला ब्यूरो
यमुनानगर। कहते हैं कि डूबते हुए को तिनके का सहारा होता है, लेकिन इस मासूम के पास न तो कोई सहारा है और न ही कोई उम्मीद। पढ़ना चाहती है, इसलिए कूड़ा बीन कर रुपये जमा करती है और किताबें और ड्रेस खरीदकर स्कूल जाती है। हम तीसरी क्लास में पढ़ने वाली इस मासूम की पहचान उजागर नहीं करेंगे, लेकिन सरकार और सिस्टम से सवाल जरूर करेंगे कि एक तरफ जहां बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के विज्ञापन पर ही करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं ऐसी मासूम बेटियां भी हैं, जिसे कोई मदद नहीं मिलती। फिर भी अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए गंदगी उठाती है।
हम बात कर रहे हैं यमुनानगर के आजाद नगर में रहने वाली आठ साल की बेटी मुस्कान (बदला हुआ नाम) की। जो सुबह स्कूल जाने से पहले एक घंटा गलियों में घूमकर कूड़ा बीनती है, फिर तैयार होकर स्कूल जाती है। पढ़ाई के बाद घर लौटकर फिर से कूड़ा बीनने निकल जाती है। शाम को इसे बेचकर चंद रुपये कमाती है। रोजाना जरूरत के सामान पर खर्च के बाद बचे हुए पैसों को एकत्र करती है। इसी पैसे से पेन, पेंसिल, कॉपी और ड्रेस खरीद कर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है।
बचपन में ही माता-पिता का उठा साया
मुस्कान के सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया। उसके बाद वह अपने मामा के पास रहने लगी। अब कुछ समय से वह अपनी बहन के पास रह रही है। इसकी बहन के परिवार की माली हालत काफी खराब है, जिसकी वजह से वे मुस्कान की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। ऐसे में मुस्कान के पास इस काम के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दूसरों की फेंकी हुई अलग-अलग तरह की चप्पलें पहनकर स्कूल जाती है तो बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन उनकी परवाह किए बिना वह पढ़ती है और फिर उसी दिनचर्या पर निकल जाती है।
चाय व बिस्कुट का नाश्ता, मिड डे मील लंच और दिनभर की कमाई से डिनर
मुस्कान चाय व बिस्कुट से नाश्ता कर घर से निकलती है। स्कूल में मिड डे मील के रूप में लंच मिल जाता है। उसके बाद दिनभर कूड़ा बीन कर जो चंद रुपयों की कमाई होती है, उसी से रात का खाना खाती है। फिलहाल उसके पास स्कूल की एक ही वर्दी है। जिसे वह शाम को रोजाना धोकर सुबह स्कूल पहनकर जाती है।
चाइल्ड लाइन को किया मना
मुस्कान मेहनत करके सफल होना चाहती है। बुधवार को चाइल्ड लाइन की निदेशिका अंजू बाजपेयी लड़की की काउंसिलिंग करने पहुंची तो उसने कह दिया कि वह भीख नहीं मांगती। अपनी मर्जी से अपना खर्चा निकाल रही है। जिस सरकारी स्कूल में वह पढ़ती है, वहां के प्रिंसिपल व टीचर्स को भी पता है।
मैं पढ़ना चाहती हूं। बचपन में ही मेरे मम्मी पापा की मौत हो गई थी। मामा-मामी के पास कुछ दिन रही। अब अपनी बहन के पास रहती हूं, लेकिन जीजा भी कोई काम नहीं करता। उन पर बोझ न पड़े इसलिए पेट भरने के लिए अपना काम खुद करती हूं। -मुस्कान
हम बच्ची की काउंसिलिंग कर रहे हैं, लेकिन वह बाल सेंटर में नहीं रहना चाहती। हम उसके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते और उसकी काउंसिलिंग जारी रखेंगे। आर्थिक मदद के भी प्रयास किए जा रहे हैं।
- अंजू बाजपेयी, निदेशिका, चाइल्ड लाइन, यमुनानगर
कमजोर आर्थिक स्थिति के बच्चों की पढ़ाई का खर्च सरकार वहन करती है। इस बारे में मैं संबंधित स्कूल से रिपोर्ट लूंगा कि इस बच्ची को वन टाइम और क्वार्टरली धनराशि और कापी किताबें व ड्रेस मिलती है या नहीं। बच्ची की हरसंभव मदद के लिए सरकार को लेटर भेजा जाएगा।
- आनंद चौधरी, डीईओ
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