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गौरैया को लुप्त होने से बचाने में जुटे मोहम्मद नईम
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अमर उजाला ब्यूरो
यमुनानगर। जगाधरी के मोहम्मद नईम पिछले 26 सालों से लुप्त हो रही गौरैया को बचाने में जुटे हैं। सात साल पहले तक उनके घर में लगी कंटीली बेल में 150-200 गौरैया रहती थी, जिनकी संख्या अब 15-20 ही रह गई है। साल दर साल गौरैया की संख्या घटने के बावजूद नईम ने हार नहीं मानी। पिछले साल उनके घर में 4-5 गौरैया ही रह गई थी, लेकिन नईम के प्रयासों से इस साल गौरैया की संख्या बढ़कर 15 तक पहुंच गई है।
जगाधरी के विशाल नगर निवासी मोहम्मद नईम ने वर्ष 1992 में अपने घर में बैंगन बलिया की बेल लगाई थी। इसके दो साल बाद ही बेल पर 15-20 गौरैया आकर बैठने लगी। नईम ने पूरे आंगन में बेल लगा दी, ताकि और अधिक गौरैया यहां आए। उन्होंने अपने आंगन में गौरैया के लिए बाजरा, रोटी, चावल और पानी रखना शुरू कर दिया। कुछ महीनों में ही बेल बढ़ी और साथ ही साथ गौरैया की संख्या भी बढ़ने लगी। मोहम्मद नईम बताते हैं कि वर्ष 1994 से वह प्रतिदिन अपने आंगन में गौरैया के लिए दाना और पानी रख रहे हैं। जब वह घर में नहीं होते हैं तो परिवार के अन्य सदस्य यह जिम्मेदारी उठाते हैं। नईम प्रतिदिन तीन वक्त गौरैया को दाना डालतेे हैं। नईम बताते है कि अल सुबह ही गौरैया उनके आंगन में चहचहाना शुरू कर देती हैं। ऐसा लगता है कि मानो वे दाना मांग रही हो। सुबह खा-पीकर गौरैया चली जाती है और दोपहर को बेल पर आकर बैठ जाती है। नईम के आंगन में दाना डालते ही गौरैया नीचे उतरकर दाना चुगने लगती हैं। इसी प्रकार शाम को नईम फिर दाना डालते हैं। बैगन बलिया की बेल काफी घनी और कंटीली होती है, जिसमें नन्ही गौरैया शिकारी पक्षियों से पूरी तरह महफूज रहती है।
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रंग लाया गौरैया को बचाने में पड़ोसियों का सहयोग
नईम बताते हैं कि दीवाली में फोड़े जाने वाले पटाखों से उनके आंगन में चहकने वाली गौरैया की संख्या लगातार कम हुई है। पटाखों की तेज आवाज से गौरैया हार्ट अटैक से मरने लगती हैं या फिर घबराकर घोंसले से उड़ जाती है। अंधेरा होने के कारण वे बिजली की तारों से टकराकर मर जाती हैं या शिकारी पक्षी उन्हें दबोच लेते हैं। पहले सिर्फ दीवाली पर आतिशबाजी चलती थी, लेकिन अब शादी और अन्य त्योहारों पर भी आतिशबाजी चलाई जाती है, जो गौरैया के लिए जानलेवा साबित हो रही है। पिछले साल मोहम्मद नईम ने अपने आस-पड़ोस के लोगों को गौरैया की दुहाई देकर तेज आवाज वाले पटाखे न बजाने का अनुरोध किया। पड़ोसियों ने भी नईम का साथ दिया और दीवाली पर तेज आवाज वाले पटाखे नहीं बजाए। इसके चलते पिछले साल उनकी बेल पर रहने वाली गौरैया नहीं मरीं और इस साल उनकी संख्या 20 तक पहुंच गई है।
फोटो-22,25
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