सोनीपत। महिला सशक्तीकरण के लिए सरकार अनेकों योजनाएं चला रही है। महिलाओं को समानता का अधिकार दिया गया है। इनके बावजूद अभी वो समय नहीं आया है, जब युवतियां व महिलाएं रात को अकेले घर से बाहर निकल सकें। किसी काम से बाहर गई बेटी जब तक घर नहीं आ जाती, तब तक माता-पिता को चिंता लगी रहती है। लड़कियों को सुरक्षित माहौल प्रदान किए बिना महिला सशक्तीकरण और समानता का अधिकार बेमानी सा लगता है। यह कहना है ब्राइट स्कॉलर स्कूल की प्राचार्य किरण दलाल का। वह मंगलवार को अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम में अपने विचार रख रही थी।
ब्राइट स्कॉलर स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में प्राचार्य किरण दलाल ने कहा कि अपनी सुरक्षा के लिए लड़कियों को खुद मजबूत होना होगा। अपने अंदर के डर को खत्म कर हाथ-पैरों को सुरक्षा के लिए कैसे प्रयोग करना है, इसके तरीके सीखने होंगे। इसके लिए सभी स्कूलों में आत्मरक्षा (सेल्फ डिफेंस) कक्षाएं लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हर क्षेत्र में अपनी उपयोगिता साबित कर रही हैं। महिलाएं किसी भी समाज का स्तंभ हैं, उसके बावजूद कई स्थानों पर समाज में उनकी भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है। इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। कार्यक्रम में अध्यापिका कविता खन्ना, डॉ. रजनी, सोनिया धनखड़, प्रेमलता, पूजा, मिनाक्षी, पूनम खत्री, अनीशा, ईशनिक व शालू ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
सोच बदलने की जरूरत
पुरुष प्रधान समाज को नारी के प्रति सोच बदलने की जरूरत है। इसकी शुरुआत घर से ही करनी होगी। समाज में आज भी ऐसे अनेकों परिवार हैं, जो लड़कियों का घर से बाहर निकलकर काम करना गलत समझते हैं। बाहर जाने वाली लड़कियों को शक की दृष्टि से देखते हैं। सबसे पहले समाज को इस नकारात्मक सोच को बदलना होगा। तब तक महिला सशक्तीकरण व समानता का अधिकार मिलना मुश्किल है।- कविता खन्ना, पीजीटी, समाजशास्त्र
--
अधिकार व जिम्मेदारियों का ज्ञान होना जरूरी
महिला सशक्तीकरण के लिए महिलाओं को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों का ज्ञान होना जरूरी है। तभी वह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं। इसके लिए समाज में जागरूकता लाने की जरूरत है। सरकार की तरफ से चलाई जा रही योजनाओं को महिलाओं तक पहुंचाना जरूरी है। इसके लिए नुक्कड़ नाटक के माध्यम से महिलाओं को सरकार की योजनाओं की जानकारी दी जाए। - डॉ. रजनी
--
समय के साथ बदलने की जरूरत
लड़कियां आज किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं। हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी उपयोगिता को साबित किया है। समाज को भी समय के साथ अपनी सोच बदलने की जरूरत है। लड़कियां काम करने घर से बाहर जाएंगी तो लोग क्या कहेंगे। परिजनों को भी अपने दिमाग से यह बादल निकालनी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा, महिला सशक्तीकरण के मायने अधूरे रहेंगे।-सोनिया धनखड़
--
लड़कों को देने होंगे संस्कार
लड़कियों को समानता का अधिकार देने, सुरक्षित माहौल प्रदान करने के लिए लड़कियों पर नियम थोपने के बजाय लड़कों को संस्कार देने होंगे। तभी लड़कियों को असल मायनों में समानता का अधिकार मिल सकेगा। इसके लिए बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार दिए जाने की जरूरत है।-प्रेमलता
--
पहले सुरक्षित तो हों लड़कियां
सरकार भले ही महिला सशक्तीकरण व समानता के अधिकार देने के दावे करती हो, लेकिन जब तक लड़कियों को सुरक्षित माहौल नहीं मिलेगा, तब इन सबके कोई मायने नहीं हैं। समाज में आज भी लड़के व लड़की में फर्क किया जाता है। सर्वप्रथम इस फर्क को दूर करने की जरूरत है। -पूजा, पीआरटी
--
महिलाओं पर रहता है दबाव
बदलते समय में भी महिलाओं और लड़कियों पर सामाजिक, सांस्कृतिक व पारिवारिक दबाव रहता है। ऐसे में उन्हें अपने दिल और दिमाग से खुद को सशक्त करने की जरूरत है। जब तक महिलाएं व लड़कियां खुद को कमजोर समझती रहेंगी, तब तक वह सशक्त नहीं बन सकती। -पूनम खत्री
--
मंथन की जरूरत
महिला सशक्तीकरण निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी को मजबूत करने की चाबी है, जो सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। समाज में जब तक पुरुषों व महिलाओं को समान नहीं समझा जाता, तब तक हम देश की आर्थिक स्थिति में सुधार की उम्मीद भी नहीं कर सकते। इसलिए सभी को इस विषय पर मंथन की जरूरत है। - अनीशा
--
लड़की को ही ठहराते हैं दोषी
महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही योजनाओं के बावजूद भी महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों पर अंकुश नहीं लगा है। जब किसी महिला के साथ कोई घटना घटित हो जाती है तो सभी उसी को ही दोषी ठहराते हैं। पुलिस में शिकायत देने जाती है तो उससे तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं। इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। - ईशनित कौर