श्रीरामकृष्ण साधना केंद्र, मुरथल में आयोजित कार्यक्रम में दीप प्रज्वलित करते राष्ट्रीय स्वयंस?
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संत तेजस्वी तो जरूर होते हैं, लेकिन वह ताप नहीं देते, बल्कि चंद्रमा जैसी शीतलता देते हैं। संतों का आचरण सामान्य जीवन पर अत्यधिक प्रभाव डालता है। वह अपने आचरण से समाज को दिशा देते हैं। संतों की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। मनुष्य में सद्भावना बेहद आवश्यक है। डॉ. मोहन भागवत सोमवार को श्री रामकृष्ण साधना केंद्र, मुरथल में संत ब्रह्मचारी प्रभुदत्त व स्वामी ब्रह्मप्रकाश महाराज की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए पहुंचे थे।
उन्होंने संतों, राजनीतिज्ञों व अन्य लोगों से कहा कि ब्रह्मचारी प्रभुदत्त को उन्होंने नहीं देखा, लेकिन उनके बारे में सुना बहुत है। वह महा व्यक्ति थे। उन्होंने एक किस्से का जिक्र करते हुए बताया कि उनके गुरुजी ने भागवत कथा ब्रह्मचारी प्रभुदत्त से सुनी थी। उन्होंने कहा कि समाज की भलाई के लिए संत मंडली हमेशा उपलब्ध है। मनुष्य को हमेशा तोड़ने का नहीं, बल्कि जोड़ने का प्रयास होना चाहिए। भागवत ने राम मंदिर का जिक्र करते हुए कहा कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र निर्माण के लिए हो रहा है, इसलिए हमें संतों का आदर करना चाहिए। बाबा डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी यही बात कही थी कि आज के जीवन में आध्यात्मिकता जरूरी है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचारी प्रभुदत्त व जवाहर लाल नेहरू ने आमने-सामने चुनाव लड़ा था, लेकिन उनके संबंध नहीं बिगड़े। उनमें सद्भावना हमेशा बनी रही। यही कारण है कि प्रभुदत्त के नाम के साथ कभी भी राजनेता शब्द नहीं जुड़ा।
उन्होंने कहा कि हनुमान की तरह काम करना चाहिए। जब काम करने की बात होती है तो हनुमान सबसे आगे होते हैं, लेकिन पारितोषिक की बात आती है तो वह पंक्ति में सबसे पीछे खड़े होते हैं। इस मौके पर अयोध्या से संत रामगोपाल दास महाराज, श्री रामकृष्ण साधना केंद्र, मुरथल के संचालक स्वामी दयानंद सरस्वती, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़, सांसद रमेश कौशिक, सांसद संजय भाटिया, विधायक मोहनलाल बड़ौली, निर्मल रानी व प्रमोद विज मौजूद रहे।