सोनीपत। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के साथ ही किताबों पर कमीशन का खेल शुरू हो गया है। हालत यह है कि किताबों की दुकानों पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की किताबें ही नहीं मिल रही हैं जबकि निजी प्रकाशकों की किताबें काफी महंगी हैं। अभिभावक निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर हैं। इसको लेकर जिला प्रशासन व शिक्षा विभाग कोई कदम नहीं उठा रहा है।
स्कूलों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पाठ्यक्रम अनिवार्य किया गया है। शिक्षा विभाग की तरफ से स्कूलों को एनसीईआरटी की किताबें ही लगवाने के निर्देश जारी किए गए हैं। इसके बाद भी निजी स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबों को ही प्राथमिकता देते हैं जबकि इन किताबों की दाम एनसीईआरटी की किताबों से तीन से चार गुणा अधिक होते हैं। दूसरी तरफ इस वर्ष बाजार में पुस्तक विक्रेताओं के पास एनसीईआरटी की पुस्तकों की कमी है। पुस्तक विक्रेताओं की मानें तो एनसीईआरटी की तरफ से किताबों की आपूर्ति नहीं की गई। ऐसे में एनसीईआरटी की नकली किताबों की आपूर्ति करने वाले सक्रिय हो गए हैं।
20 से 25 फीसदी तक बढ़ाए दाम : गत वर्ष सरकार ने निजी प्रकाशक की किताबों व स्टेशनरी के दाम निर्धारित करने की बात कही थी। एक साल बाद भी सरकार की तरफ से किताब और स्टेशनरी के दाम निर्धारित करने के लिए न तो कमेटी बनी और ना ही कीमत निर्धारित की गई। हालात यह हैं कि निजी प्रकाशकों ने गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष अपनी किताबों के दाम भी 20 से 25 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। वहीं अधिकतर निजी स्कूलों की तरफ से फीस में भी करीब 10 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है। जिस कारण अभिभावकों की जेब ढीली हो रही है और उनका बजट बिगड़ रहा है।
स्कूल काउंटर व निर्धारित दुकानों पर ही मिलती हैं किताबें
निजी स्कूलों की तरफ से लगाई जा रही किताबों या तो स्कूल काउंटर पर या फिर निर्धारित दुकानों पर ही मिल रही हैं। यदि कोई अभिभावक बाजार में किसी भी दूसरी दुकान से किताबें लेना चाहे तो नहीं मिलती हैं। इससे अभिभावक निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने को मजबूर हैं। अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूल हर साल प्रकाशक बदल देते हैं, जिससे वह पुरानी किताबें भी प्रयोग नहीं कर सकते। निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ न जिला प्रशासन ध्यान दे रहा है और ना ही शिक्षा विभाग के अधिकारी इस तरफ गंभीर है।
नकली किताबों पर अधिक कमीशन
जानकारों की मानें तो एनसीईआरटी की नकली किताबों में प्रयोग किए जाने वाले कागज व व छपाई में प्रयुक्त स्याही की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है जिस पर प्रकाशक का खर्च कम आता है। जबकि एनसीईआरटी की किताबों पर उच्च गुणवत्ता का कागज व स्याही प्रयोग की जाती है। जिस पर खर्च कम आता है और पुस्तक विक्रेताओं को भी 15 फीसदी तक ही कमिशन मिलता है। जबकि नकली पुस्तकों पर 40 फीसदी तक कमीशन मिल जाता है। इसलिए कुछ पुस्तक विक्रेता भी अधिक कमीशन के चक्कर में नकली किताबें बेचते हैं। जबकि कोई भी पुस्तक विक्रेता एनसीईआरटी की नकली किताबें न तो रख सकता है और न ही बेच सकता है। ऐसा करते हुए पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई का प्रावधान है।
वर्जन
स्कूलों में एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम ही अनिवार्य किया गया है। कोई भी स्कूल किसी अभिभावक को निर्धारित पुस्तक विक्रेता के पास से ही किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता और ना ही स्कूल में काउंटर लगाकर पुस्तकें व स्कूल पोशाक बेच सकता है। इस प्रकार की अभी तक कोई शिकायत नहीं मिली है, यदि शिकायत मिलती है तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।-नवीन गुलिया, जिला शिक्षा अधिकारी, सोनीपत।