बैठकें होती रहीं, रणनीतियां बनती रहीं
एक महीने के आंदोलन के दौरान किसान संगठनों के नेताओं की 22 बार बैठक हुई, जिसमें देशभर के किसान संगठनों के नेता शामिल किए गए। इनमें नेशनल हाईवे जाम करके दिल्ली की घेराबंदी, टोल प्लाजा फ्री, जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन, अनशन तक की रणनीति बनाई गई। वहीं किसानों ने गुस्से में एक्सप्रेस वे तक रोक दिया। किसानों का आंदोलन इतना कुछ करने के बाद भी थमता नहीं दिख रहा है, बल्कि वह लगातार आंदोलन को चलाए रखने की रणनीति तय कर रहे है और सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
सरकार ने 6 प्रस्ताव भेजे, 3 बार बातचीत, गतिरोध बढ़ा
किसानों के आंदोलन को देखते हुए सरकार ने एक महीने में छह बार बातचीत का प्रस्ताव भेजा। किसानों ने शुरुआत में तीन बार बातचीत की, जिससे कानूनों को लेकर कोई फैसला हो सके और किसान आराम से अपने घर चले जाएं। कृषि मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक से बातचीत हुई। हर बार बातचीत अगले दौर के लिए टलती रही। जिसके बाद किसान नेताओं ने ठोस प्रस्ताव आने के बाद ही बातचीत करने का फैसला लिया।
अब तीन बार सरकार प्रस्ताव भेज चुकी है, लेकिन दो बार किसान उनको नकार चुके है तो तीसरे का अभी जवाब दिया जाना है। हालांकि उसके एजेंडे को देखते हुए भी किसान उसे लगभग नकार चुके हैं, लेकिन उसके बावजूद बैठक में आधिकारिक फैसला लेने की बात कही जा रही है। किसानों ने साफ कर दिया है कि वह केवल कृषि कानून रद्द करने के एजेंडे पर बातचीत करेंगे और कानून रद्द कराकर ही वापस जाएंगे। इस तरह से आंदोलन खत्म होने की जगह गतिरोध बढ़ता जा रहा है।
किसान आंदोलन को एक महीना बीत चुका है और किसानों ने साफ कर दिया है कि कृषि कानून रद्द कराने से कम कुछ मंजूर नहीं है। सरकार लगातार प्रस्ताव भेजकर बरगला रही है, जबकि सही मुद्दे पर बात ही नहीं कर रही है। सरकार को आंदोलन खत्म कराना है तो उसे ठोस प्रस्ताव भेजकर बातचीत करनी होगी। हमारी ओर से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला हुआ है। आंदोलन चाहे एक महीने की जगह एक साल चलाना पड़ा, लेकिन हमारी मांग कृषि कानून रद्द करने की रहेगी। - दर्शनपाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा