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Sonipat: नाबालिग था तो किया कुकर्म, बालिग होने पर मिली उम्रकैद, इस कानून के तहत सुनाई सजा

Tue, 09 May 2023 08:47 PM IST
भूपेंद्र सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत (हरियाणा)

सार

गोहाना सदर थाना क्षेत्र के गांव से दस साल के बच्चे को खरखौदा के गांव में ले जाकर कुकर्म किया था। किशोर ने उसे 20 रुपये दिए और अपनी बाइक पर बैठाकर बाजरे के खेत में ले गया। वहां पर उसने उसके साथ कुकर्म किया और उसे वहीं पर छोड़कर भाग गया। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हरियाणा के सोनीपत में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरुचि अतरेजा सिंह ने दस साल के बच्चे से कुकर्म करने के दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। सबसे बड़ी बात यह है कि दोषी ने जिस समय कुकर्म किया था उस समय वह नाबालिग था, मगर उसे जुवेनाइल जस्टिस संशोधन कानून 2015 के तहत उम्रकैद की सजा हुई है। अदालत ने उस पर एक लाख रुपये जुर्माना भी किया है।

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गोहाना के सदर थाना क्षेत्र के गांव निवासी व्यक्ति ने 17 अगस्त, 2017 को खरखौदा थाना पुलिस को बताया था कि उनका दस वर्षीय बेटा घर से खेलने के लिए निकला था। वह रात आठ बजे तक घर नहीं आया तो उन्होंने उसकी तलाश शुरू की तो वह सिसाना-गोहाना मार्ग पर मौजम नगर गांव के मोड़ के नजदीक रोते हुए मिला।

बच्चे से जब उन्होंने रोने का कारण पूछा था तो उसने बताया कि जोहड़ के पास से गांव के ही किशोर ने उसे 20 रुपये दिए और अपनी बाइक पर बैठाकर बाजरे के खेत में ले गया। वहां पर उसने उसके साथ कुकर्म किया और उसे वहीं पर छोड़कर भाग गया।
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बच्चे के पिता ने इसकी शिकायत पुलिस को दी। पुलिस ने उनके गांव के किशोर पर 4 पॉक्सो एक्ट व भादंसं की धारा 377 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था उसे पकड़ लिया था। नाबालिग होने के कारण उसे बाल सुधार गृह भेज दिया गया था।

मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरुचि अतरेजा सिंह ने आरोपी को दोषी करार देते हुए मंगलवार को 6 पॉक्सो एक्ट में उम्रकैद और 50 हजार रुपये जुर्माना तथा भादंसं की धारा 377 में उम्रकैद और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना राशि के एक लाख रुपये पीड़ित बच्चे को देने के आदेश दिए हैं। दोनों सजा एक साथ चलेंगी।

जुवेनाइल जस्टिस संशोधन कानून 2015 के तहत सुनाई उम्रकैद
कुकर्म करने के मामले में दोषी करार दिया युवक वारदात के दौरान नाबालिग था। उसे जुवेनाइल जस्टिस संशोधन कानून-2015 के तहत सजा सुनाई है। जुवेनाइल कोर्ट ने नाबालिग के खिलाफ व्यस्क के समान रेगुलर ट्रायल कोर्ट में मुकदमा चलाने के आदेश दिए थे। दिसंबर 2012 के निर्भया कांड में एक नाबालिग की भूमिका सबसे अधिक घिनौनी थी।

उसके नाबालिग होने के कारण उसे बाल सुधार गृह में तीन साल के लिए भेजा गया था। इसके बाद उसे छोड़ दिया गया था। इसके बाद कानून में बदलाव कर जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम 2015 लाया गया। इसे 15 जनवरी, 2016 से लागू किया गया। इस कानून के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड प्रारंभिक जांच कर अपराध की प्रकृति और गंभीरता का पता लगाता है।

किशोर बोर्ड पता करता है कि अपराध एक बालक के तौर पर किया गया है या व्यस्क की मानसिकता से। बोर्ड में मनोचिकित्सक और समाज के विशेषज्ञ होते हैं। वह निर्णय लेते हैं कि मामले को बाल अदालत में भेजा जाए या सामान्य ट्रायल कोर्ट में सुनवाई की जाए।

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