हितेश चतुर्वेदी
सिरसा। जिले में पारिवारिक विवाद बढ़ते ही जा रहे हैं। शादी के बाद छोटी-मोटी बातों को आपस में सुलझाने के बजाय बात सीधा तलाक तक पहुंच जाती है। आलम ये है कि दिसंबर 2018 से अप्रैल 2023 तक फैमिली कोर्ट में पति-पत्नी विवाद से जुड़े 7878 केस आ चुके हैं।
हालांकि फैमिली कोर्ट में आ रहे मामलों में ज्यादातर का निपटान आपसी समझौता करवाकर किया जाता है। सिरसा में फैमिली कोर्ट की स्थापना 21 दिसंबर 2018 को हुई थी। अब करीब 1313 केस कोर्ट में लंबित हैं। फैमिली कोर्ट में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुमित गर्ग हैं। जिनकी गिनती बहुत सुलझे और अनुभवी न्यायाधीशों में होती है।
10 लाख आबादी पर स्थापित की जाती है कोर्ट
विवाह और पारिवारिक बातों से संबंधित विवादों में सुलह व समझौते करवा कर विवादों को जल्द निपटने के लिए 1984 में फैमिली कोर्ट एक्ट पारित किया गया था। इस एक्ट के तहत हर नगर में पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना की गई है। इस कानून के लागू होने के बाद राज्य सरकारें किसी नगर या कस्बे के ऐसे क्षेत्र के लिए जिसकी जनसंख्या दस लाख से अधिक है, वहां पारिवारिक न्यायालय की स्थापना करती है। पारिवारिक न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए न्यायाधीश को काफी अनुभवी होना चाहिए। इसलिए ऐसा व्यक्ति पारिवारिक न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, जो कम से कम 7 वर्षों तक न्यायिक पद रहा हो। न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के समय यह ध्यान रखा जाता है कि ऐसे व्यक्ति को पारिवारिक न्यायालय का न्यायाधीश बनाए जो विवाह संस्था की सुरक्षा करने,बालकों का कल्याण करने और सुलह परामर्श से विवादों का निपटारा करने में अनुभवी हो।
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इन विवादों का किया जाता है निपटारा
विवाह को शून्य घोषित करना।
तलाक का मामला।
दांपत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना।
न्यायिक पृथक्करण।
विवाह की विधिमान्यता।
भरण पोषण से संबंधित वाद।
ऐसे काम करती है कोर्ट
फैमिली कोर्ट अधिकतर मामलों में प्रयास करती है कि केस आपसी सुलह और समझौते से खत्म हो जाए। यदि पारिवारिक न्यायालय को ऐसा लगता है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता की संभावना है, तो कार्यवाही को ऐसे समय के लिए स्थगित कर सकता है, ताकि समझौता हो सके। पारिवारिक न्यायालय सिविल कोर्ट समझा जाता है और उसे सिविल कोर्ट की सारी शक्तियां होती हैं।
बंद कमरे में होती है सुनवाई
पारिवारिक न्यायालय की एक मुख्य विशेषता यह होती है कि इसकी सुनवाई बंद कमरे में की जा सकती है। किसी पारिवारिक न्यायालय के समक्ष कार्रवाई में यह आवश्यक नहीं है कि गवाहों का साक्ष्य विस्तार से लिखा जाए। पारिवारिक न्यायालय के द्वारा पारित किसी भी आदेश का वही प्रभाव होगा, जो किसी सिविल न्यायालय का होता है और उसका निष्पादन सिविल न्यायालय के आदेश के निष्पादन के तौर तरीकों से ही होगा।
वर्जन
आधुनिक समाज में पति-पत्नी के बीच आपसी विचारधारा न मिलने के कारण विवाद की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इसी कारण तलाक के मामलों में भी वृद्धि होती जा रही है। इसका एक कारण आपसी विश्वास में कमी भी है। इस समस्या का समाधान यह है कि शादी से पहले लड़का-लड़की के बीच विचारधारा का पूरा आदान-प्रदान होना चाहिए और मनोवैज्ञानिक की राय जरूरी लेनी चाहिए। - प्रो. डॉ. रविंद्र पूरी, वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक सिरसा।