शहर के मोहंता मार्केट स्थित दुकान पर करवाचौथ के लिए खरीदारी करतीं युवतियां
सिरसा। भारतीय संस्कृति में करवाचौथ के व्रत का विशेष महत्व है। बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि हमारी संस्कृति में विवाहित महिलाएं बड़ी लग्न के साथ करवाचौथ की कथाएं सुना करती थीं। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने संस्कृति के इस त्योहार की गरिमा को फीका कर दिया है। जहां सामूहिक रूप से कथा सुनने का चलन था वहीं आज मोबाइल में कथा सुनकर काम चल जाता है। ऐसे में व्रत की महत्ता को समझ पाने के स्तर में बदलाव आया है। यही वजह है कि आधुनिक तकनीकी ज्ञान इस व्रत की महत्ता पर प्रभाव डाला है।
60 वर्षीय इंद्र देवी बताती हैं कि उनके जमाने में करवाचौथ के अलग ही मायने हुआ करते थे। क्योंकि उस समय व्रत को व्रत के रूप में ही लिया जाता था। इस समय व्रत पर फैशन और आधुनिकता का रंग चढ़ गया है। इंद्र देवी बताती है कि पहले के समय में महिलाएं व्रत के दिन एक-दूसरे घर जाया करती थी। लेकिन आज के समय में एंड्रायड फोन आ जाने से महिलाएं अब एक - दूसरे के घर नहीं जाती बल्कि अपने - अपने घरों में कहानी सुन लेती है। जिससे त्योहार का रंग फीका हो गया है।
पहले मनियारी घर - घर पहनाने आती थी चुड़ियां
70 वर्षीय कमला रानी बताती हैं कि पहले के समय में करवाचौथ पर नई चुड़ियां पहनाने के लिए मनियारी घर - घर आया करती थी। गांव की सभी महिलाएं एक जगह इक्ट्ठा होकर हंसी ठिठोली करते हुए एक साथ एक मनियारी से चुड़ियां पहनती थी। लेकिन आज समय बदल गया है। अब महिलाओं की भीड़ घरों में नहीं बाजारों में अधिक दिखती है। वहीं महिलाएं अपनी बुजुर्ग सास को भी उपहार स्वरूप कुछ न कुछ देती थी। जिसे तील कहा जाता था। लेकिन आज आधुनिकता की दौड़ में बुजुर्ग पीछे छूट रहे है।
रात का खाना होता था किसी एक के घर
65 वर्षीय कौशल्या देवी ने बताया कि पहले जब करवाचौथ का व्रत आता था तो एक अलग ही उमंग मन में होती थी। पूरा दिन कैसे निकल जाता था पता ही नहीं लगता था। लेकिन आज महिलाएं सुबह से लेकर दोपहर तक पार्लरों में निकाल देती हैं। उसके बाद शाम के समय में कहानी सुनकर करवा पार्टी में निकल जाती हैं। लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था। पहले सभी महिलाएं सुबह से ही एक - दूसरे के घर इक्ट्ठा होना शुरू हो जाती थी। जिसके बाद रात का खाना भी किसी एक महिला के घर में होता था। इस दौरान सवा पांच किलो की कढ़ाई बनती थी। जिसे सभी मिलकर खाते थे।