किसानों ने डबवाली अनाज मंडी में सरसों खरीद में हेराफेरी का आरोप लगाया है। बुधवार को एक मामले में किसान व्यापारियों से उलझ गए। बोली की खानापूर्ति कर रहे कर्मचारियों को भी खरी-खोटी सुनाई। हेराफेरी देख किसानों ने फसल बेचने से ही मना कर दिया और एसडीएम डबवाली को इस मामले की शिकायत दी। वहीं मामला उजागर होने से नाराज होकर एक फर्म के मालिक ने यहां तक कह दिया कि यह सारा खेल अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा है। और यह कोई एक साल से नहीं पिछले तीन सालों से चल रहा है। सभी आढ़ती छह प्रतिशत टैक्स बचाने के लिए ऐसा करते हैं।
गांव लखुआना के किसान चांद राम ने बताया कि वह पिछले दो दिनों से सरसों लेकर बोली के इंतजार में अनाज मंडी में बैठा हुआ है। बुधवार को मार्केट कमेटी के कर्मचारी बोली लगाने आए। उसकी फसल का औना-पौना दाम 3390 रुपये तय किया। बिना किसी मानक के फसल का भाव तय करते हुए इक्का-दुक्का व्यापारियों के इशारे पर कमेटी कर्मचारियों ने उसकी फसल को रजिस्टर में नोट कर लिया, जबकि उसने अपनी फसल बेचने से ही मना कर दिया। किसान के अनुसार ओलावृष्टि के चलते फसल आधे से भी कम रह गई है। दूसरी ओर बोली की प्रक्रिया सही न होने से किसानों का शोषण हो रहा है।
उसके पड़ोस में रखी सरसों की ढ़ेरियों को 3700 रुपये प्रति क्विंटल तक भाव मिला। गांव दीवानखेड़ा के किसान बलकार सिंह, बलजिंद्र सिंह, गुरचरण सिंह मलिकपुरा, अवतार सिंह शेरगढ़ ने बताया कि उनकी फसलों को भी औने-पौने दाम में खरीदने का प्रयास कर सरासर उन्हें लूटा जा रहा है। किसानों ने एक फर्म का नाम लेते हुए बताया कि वे उन पर दो नंबर में फसल खरीदने का दबाव डाल रही है। एक ही फसल की दो ढ़ेरियां लगाने पर उसका अलग-अलग भाव लगाया जा रहा है। किसानों बोली की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए एसडीएम डबवाली की अनुपस्थिति में नायब तहसीलदार जगदीश चंद्र से मिले। उन्हें आपबीती बताते हुए कार्रवाई की मांग की। तहसीलदार के आश्वासन पर किसानों ने एसडीएम कार्यालय में शिकायत करके जांच की मांग की है।
छह प्रतिशत टैक्स बचाने को होता है खेल
एक फर्म मालिक ने बताया कि किसान अपनी फसल अनाज मंडी में बिकने के लिए लेकर आता है। लेकिन यहां आते ही आंकड़ों का खेल शुरू हो जाता है। व्यापारी को फसल खरीद के बदले पांच प्रतिशत टैक्स तथा एक प्रतिशत मार्केट फीस अदा करनी पड़ती है। छह प्रतिशत बचाने के लिए व्यापारी मार्केट कमेटी अधिकारियों से हाथ मिलाता है। जो फसल किसान लेकर आता है, उसको कागजों में कम दर्शाया जाता है। उदाहरण के तौर पर 12 क्विंटल फसल की अपेक्षा कागजों में महज चार या पांच क्विंटल दर्ज किया जाता है। संबंधित किसान से मिलीभगत करके उसका भाव अन्य किसानों की अपेक्षा ज्यादा देता है। इसका सीधा नुकसान सरकार को होता है। फर्म मालिक की बात पर विश्वास करें तो इस खेल में मार्केट कमेटी अधिकारियों का हिस्सा भी फिक्स है। प्रति 50 किलोग्राम की भर्ती पर मार्केट कमेटी में 10 से 15 रुपये जाते हैं। जो कर्मचारियों तथा अधिकारियों में बंटते हैं। जो किसान समझौता नहीं करते, उनकी फसल का बहुत कम भाव लगाया जाता है।
फसल का दाम कम मिलने पर किसान मुझे मिले हैं। उन्होंने एसडीएम कार्यालय में शिकायत दर्ज करवाई है। एसडीएम जैसा आदेश करेंगे, उस अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
-जगदीश चंद्र, नायब तहसीलदार, डबवाली
किसानों ने कम दाम मिलने की शिकायत एसडीएम कार्यालय में की है। मैं मौके पर गया था। किसानों को समझाया गया है। कर्मचारी रजिस्टर में सरसों का कम वजन नहीं लिख रहे हैं। कमेटी पर भ्रष्टाचार के आरोप निराधार हैं।
-हेतराम, कार्यकारी सचिव, मार्केट कमेटी, डबवाली