पर्ल्स ग्रुप के सीएमडी समेत चार लोगों को गिरफ्तार करने के बाद
निवेशकों की सांसें अटक गई हैं। अकेले डबवाली शहर में 100 से ज्यादा बड़े
निवेशक थे।
पूरा सिस्टम चेन नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। ऐसे में छोटे
निवेशकों की संख्या का आंकलन हजारों में होता है। चूंकि एक बड़े निवेशक के
नीचे कम से कम 15 से 20 लोग काम कर रहे थे। भारी रिटर्न मिलने के लालच में
लोगों के करोड़ों रुपये फंस गए हैं।
कई साल पहले पर्ल्स एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) के एजेंट डबवाली
में कई योजनाएं लेकर आए थे। कंपनी के दिखाए सब्जबाग में फंसकर कई लोगों ने
मोटी रकम लगाकर आरडी तथा एफडी खाते खुलवाए। जैसे-जैसे एजेंटों की तादाद
बढ़ती चली गई, वैसे-वैसे चेन नेटवर्क के जरिए कंपनी का साम्राज्य फैलता
गया।
अकेले डबवाली शहर में ही 100 से ज्यादा बड़े एजेंट खड़े हो गए।
ग्रामीण आंचल को साथ जोड़ें तो एजेंटों की तादाद करीब एक हजार तक पहुंच
जाएगी। एजेंटों के आगे सब एजेंट बने। कंपनी की लुभावनी योजनाओं में हजारों
लोगों ने निवेश किया। त्रिवेणी इलाके में करोड़ों के निवेश को देखते हुए
कंपनी ने चौटाला रोड पर फरवरी 2013 में अपना आउटलेट खोल दिया।
मल्टीनेशनल
कंपनी की तरह कार्य करते हुए लोगों को नियंत्रण मूल्य पर ब्रांडेड कंपनियों
के रेडीमेड तथा किरयाना का सामान मुहैया करवाना शुरू कर दिया। कंपनी ने
आउटलेट में वरिष्ठ प्रबंधक, प्रबंधक तथा एकाउंटेंट के साथ-साथ सेल्समैन पर
युवाओं को नौकरी दी।
करीब एक साल तक यह कार्यालय लगातार खुला रहा। बताया जा
रहा है कि कंपनी डबवाली जैसे शहर में प्रति माह एक लाख रुपये से ज्यादा का
खर्च करती थी। जैसे ही कंपनी का फर्जीवाड़ा उजागर हुआ तो निवेशकों ने
सवाल-जवाब करने शुरू कर दिए। कंपनी अपना आउटलेट बंद कर दिया।
सिरसा, बठिंडा में होती थीं मुलाकातें
बेशक कंपनी ने डबवाली में अपना कार्यालय खोल दिया। लेकिन कंपनी के बड़े
एजेंटों की मुलाकातें बठिंडा तथा सिरसा में स्थित कार्यालयों में होती थी।
जिसमें कंपनी के बड़े अधिकारी आकर योजनाओं को एजेंटों के आगे रखते थे।
यह थी योजना
कंपनी के एक बड़े एजेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कंपनी खुद को
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अधीन बताती थी।
एजेंट से एग्रीमेंट भरवाया जाता
था। जोकि मैनेजर, पीएसीएल, नई दिल्ली के नाम होता था। कंपनी निवेशक को एक
प्लॉट देने का वादा करती थी। जोकि दक्षिण भारत में स्थित होता था।
कंपनी का
दावा था कि छह साल बाद निवेशक को निवेश की गई रकम से दोगुना पैसा मिलेगा।
निवेशक एग्रीमेंट के अनुसार प्लॉट या फिर उसकी मार्केट वेल्यू भी ले सकता
है। लालच में लोग फंसते गए।
जमा कराते थे 120 रुपये प्रति माह
एफडी के साथ-साथ आरडी खाते भी खोले जाते थे। एजेंट 120 रुपये मासिक वसूल
करता था। मासिक किश्त 360, 500 या फिर 1000 रुपये हो सकती थी।
एजेंटों को
एक टारगेट दिया जाता था। टारगेट पूरा करने वालों को कमीशन के साथ-साथ
पुरस्कार भी दिए जाते थे। वर्ष 2009 की बात करें तो 15 लाख का टारगेट
प्राप्त करने वाले को तीन रात, चार दिन की विदेश यात्रा करवाई जाती थी।
इसके अतिरिक्त कंपनी स्कूटर, बाइक या फिर कार गिफ्ट में देने का वादा करती
थी।
तीन साल पहले बदला नाम
साढ़े चार लाख रुपये से ज्यादा निवेश करने के साथ-साथ कंपनी के लिए दस
निवेशक तैयार करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि करीब तीन साल पूर्व बठिंडा
कार्यालय में आयोजित बैठक में अधिकारी ने बताया कि कंपनी ने अब विदेशों में
निवेश करना शुरू कर दिया है।
इसलिए कंपनी का नाम पीएसीएल इंडिया से बदलकर
पीएसीएल कर लिया है। असल में उस समय अदालत ने संबंधित कंपनी को फटकार लगाई
थी। योजना बंद करने के आदेश दिए थे।
शिक्षित वर्ग फंसा, अब अदालत से उम्मीद
पीएसीएल में निवेश करने वाले सबसे ज्यादा शिक्षित वर्ग शामिल था। अध्यापकों
के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों की लंबी फेहरिस्त है। जो लालच में अपने
करोड़ों रुपये फंसा बैठे।
निवेशकों का कहना है कि कृषि भूमि के विकास तथा
बिक्री के नाम पर 45 हजार करोड़ रुपये का घोटाला करने वाले लोगों के खाते
अदालत ने सील करवाए हुए हैं।
अदालत से उम्मीद है कि उनके खातों में जमा
पैसा उन्हें मिलेगा। गौरतलब है कि घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। सीबीआई
ने कंपनी के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया है।