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Rohtak: घिलौड़ कलां में ग्रामीणों ने स्कूल पर जड़ा ताला, बोले- हाइवे पर लगाएंगे बच्चों की कक्षाएं

Fri, 21 Jul 2023 09:12 AM IST
नवीन दलाल माई सिटी रिपोर्टर, रोहतक (हरियाणा)

सार

गांव के सरपंच अनिल देशवाल ने बताया कि उनके गांव में 12वीं तक का स्कूल है, जो 1948 में बनी बिल्डिंग में चलता है। 2018 में पीडब्ल्यूडी ने स्कूल की बिल्डिंग को कंडम घोषित कर दिया था। पुरानी बिल्डिंग को तोड़कर नई बिल्डिंग बनाने का एस्टीमेट तैयार हो चुका है, जिसकी फाइल डीईओ कार्यालय से गायब है।
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ग्रामीणों का प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रोहतक के घिलौड़ कलां गांव में शुक्रवार सुबह ग्रामीणों ने स्कूल पर ताला जड़ दिया। आरोप है कि पांच साल पहले स्कूल की बिल्डिंग कंडम घोषित की थी, लेकिन अब तक नई बिल्डिंग नहीं बनाई। ऐसे में वे अपने बच्चों की जान खतरे में नहीं डाल सकते। एक सप्ताह में प्रशासन ने कोई समाधान नहीं निकाला तो वे हाइवे पर कक्षाएं लगाएंगे। 

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सरपंच बोले, 2018 में कंडम घोषित की थी बिल्डिंग, एक सप्ताह में कोई समाधान नहीं
गांव के सरपंच अनिल देशवाल ने बताया कि उनके गांव में 12वीं तक का स्कूल है, जो 1948 में बनी बिल्डिंग में चलता है। 2018 में पीडब्ल्यूडी ने स्कूल की बिल्डिंग को कंडम घोषित कर दिया था। पुरानी बिल्डिंग को तोड़कर नई बिल्डिंग बनाने का एस्टीमेट तैयार हो चुका है, जिसकी फाइल डीईओ कार्यालय से गायब है। अब बारिश में स्कूल के अंदर व बाहर पानी भरा हुआ है।

बिल्डिंग कभी भी गिर सकती है, ऐसे में ग्रामीण अपने बच्चों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहते। इसलिए मजबूरी में दूसरी जगह ग्रामीण बच्चों के दाखिल करवा रहे हैं, लेकिन गरीब परिवार ऐसा करने में असमर्थ हैं। पंचायत ने निर्णय लिया है कि एक सप्ताह तक स्कूल पर ताला जड़ा रहेगा। इसके बाद भी कोई समाधान नहीं हुआ तो वे हाइवे पर छात्रों की कक्षाएं लगाएंगे, किसी तरह की अनहोनी की जिम्मेदारी प्रशासन की रहेगी। 
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स्कूल 114 विद्यार्थी बचे, दो कमरों लगती हैं पांच कक्षाएं, छह कक्षाएं खुले में
सरपंच का कहना है कि स्कूल में ज्यादातर बिल्डिंग कंडम है। दो कमरे थोड़े ठीक हैं, उनमें पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक साथ लगाई जा रही हैं। छठी से 12वीं तक की कक्षाएं खुले में लगती हैं। बारिश के मौसम में छुट्टी कर दी जाती है। ऐसे में स्कूल में मात्र 114 छात्र रह गए हैं। ग्रामीण निजी स्कूलों में बच्चों को मजबूरी के कारण पढ़ाने पर मजबूर हैं।

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