रोहतक। उस मां के दिल पर भला क्या गुजरेगी, जिसे अपनी ममता को टुकड़ों में बांटने पर मजबूर होना पड़े, उसको कहा जाए कि अगर उसे पाकिस्तान में रह रहे अपने बच्चों से मिलना है, तो भारत में अपनी ही कोख से पैदा हुए बच्चों को छोड़ना पड़ेगा। इसी व्यथा को प्रस्तुत किया सार्थक सांस्कृतिक संघ करनाल के कलाकारों ने अपने नाटक इक विचारी मां में।
नाटक का मंचन सप्तक सांस्कृतिक संस्था, पठानिया वर्ल्ड कैंपस और सोसर्ग की ओर से आयोजित घर फूंक थिएटर सीरीज के तहत स्थानीय किशनपुरा में स्थित सोसर्ग स्टूडियो में किया गया। सार्थक के कलाकारों ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी बड़े भाई साहब का भी मंचन किया। इसमें घर से दूर होस्टल में रहकर पढ़ने वाले दो भाइयों के आपसी रिश्तों को दर्शाने के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था पर सवालों को बड़े ही तार्किक ढंग से उठाया गया।
विभाजन की त्रासदी की पृष्ठभूमि में लिखे गए हरसरण सिंह के नाटक इक विचारी मां की कहानी एक महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे एक हिंदू-सिख युवक पाकिस्तान जाने वाले काफिले से उठा लाता है। असल में, पाकिस्तान जाते समय दंगों में महिला के पति की हत्या कर दी जाती है और वह विधुर युवक शादी करने के लिए उसका अपहरण कर अपने घर ले आता है। इसी बीच महिला के दो छोटे बच्चे उससे बिछड़ जाते हैं, जिन्हें वह मरा मान लेती है। युवक महिला का धर्म परिवर्तन कराकर उससे शादी कर लेता है। महिला इसे अपनी नियति समझती है। इस बीच उसके दो बेटे हो जाते हैं, जिन्हें वह बहुत प्यार करती है। इसके बावजूद बिछड़े बेटों को नहीं भूल पाती और अक्सर उनको याद कर उदास रहती है। दस वर्ष बाद भारत में रह गई मुस्लिम औरतों को ढूंढते हुए एक पाकिस्तानी अधिकारी उनके घर पहुंचता है, जो किस्मत से महिला का रिश्तेदार होता है। वह खोए दोनों बच्चे को जिंदा होने की बात कहता है। महिला को पाकिस्तान ले जाने का ऑर्डर होता है, लेकिन उसे भारत में पैदा हुए बच्चों को साथ नहीं ले जाने दिया जाता। इसी गम में महिला अपने प्राण त्याग देती है और नाटक का दुःखद अंत होता है।
इस मौके पर संजीव लखनपाल की ओर से निर्देशित दोनों नाटकों में बीके आत्रे, दविंदर, रजत, कृतिका, सुप्रिया, ग्रेशा, कुंजल, रोहित, सतपाल, तान्या और संजीव लखनपाल ने उम्दा अभिनय किया। इस पर दर्शकों की भरपूर दाद मिली और उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का हौसला बढ़ाया।
समझकर कुछ देर पढ़ना, जबरदस्ती सारा दिन पाठ रटने से ज्यादा सही
दूसरे नाटक बड़े भाई साहब में बड़ा भाई सारा दिन किताब लिए पढ़ता रहता है। वह खेलकूद को समय की बर्बादी मानता है और मन होने के बावजूद खेलने कूदने की बजाय रट्टू तोता बना रहता है। फिर भी वह हर बार फेल हो जाता है। इसके उलट, छोटा भाई खूब खेलता कूदता है और थोड़ी देर पढ़ने के बावजूद हमेशा कक्षा में प्रथम आ जाता है। नाटक शिक्षा देता है कि ध्यान से और समझकर कुछ देर पढ़ना, जबरदस्ती सारा दिन पाठ रटने से ज्यादा सही है।