मां भावना के साथ खिलाड़ी सुहाना।
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मैं भी इंसान हूं। मुझे भी देर तक सोना, फास्ट फूड खाना, टीवी देखना, शादी में जाना पसंद है। मुझे कुछ करना है, बनना है। इसके लिए दिन के 12 घंटे कम पड़ते हैं। अपने दिन के घंटे बढ़ाने व पढ़ाई के साथ टेबल टेनिस (टीटी) चैंपियन बनने के लिए इन भौतिक सुखों का त्याग करना पड़ा है। सुबह समय से उठाना, व्यायाम व अभ्यास करना, पौष्टिक आहार लेना, जरूरत के हिसाब से आराम करना, यही मेरी दिनचर्या है। टीवी, सोशल मीडिया से ही दूरी है।
यहां तक कि रिश्तेदार व उनके शादी समारोह तक में नहीं जाती हूं। यह कहना है अंडर-17 व 19 वर्ग में देश की पहले व अंडर-17 में दुनिया की तीसरे रैंक की खिलाड़ी सुहाना सैनी का। अमर उजाला से हुई बातचीत में इस खिलाड़ी ने अपने चैंपियन बनने की राह में आए सुखों व आराम से दूरी बनाने की कहानी साझा की।
हरियाणा के रोहतक शहर के आर्य नगर में रहने वाली खिलाड़ी का कहना है कि मेरी मां भावना सैनी ने खेलों को एक पेशे के रूप में चुना था। वे स्पर्धाएं खेलती थीं। राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई। वह कठिन समय था। उनके खेलने पर माता-पिता, परिवार, पड़ोसी सभी ने रोकटोक की। चूंकि मेरी मां सशक्त व संघर्षशील महिला हैं, इसलिए वे अपने फैसले पर डटी रहीं।
मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे, ऐसी मां मिली। मेरे पिता विकास सैनी, दादा सतीश सैनी, दादी कमला सैनी सभी ने मुझे खेलने के लिए प्रेरित किया व आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह है कि अंडर-17 वर्ग में खेलते हुए दुनिया में तीसरे रैंक की खिलाड़ी बन पाई।
मैं भी किसी का जीवन बदल सकूं
सुहाना का कहना है कि जैविक संरचना को छोड़ दें तो मानसिक स्तर पर लड़के व लड़की के बीच कोई अंतर नहीं है। इसलिए महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से उसी अनुसार अपना कॅरिअर चुनना चाहिए। महिलाओं का समर्थन करते हुए इस खिलाड़ी ने कहा कि दुनिया की हर लड़की को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का मौका मिलना चाहिए।
हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। यहां पुरुषों व महिलाओं को समान अधिकार हैं। जीवन में मैं कुछ बनी या बड़ा कर सकी तो जरूर करूंगी। मेरा प्रयास किसी ऐसे जरूरतमंद बच्चे को आगे बढ़ाकर उसके जीवन में बदलाव लाना रहेगा।