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हिंदी दिवस पर विशेष : मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिंदी

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जन-जन की अभिलाषा है हिंदी,
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मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिंदी।
- पवन गहलोत, कवि एवं लेखक।
कल शाम को टहलते हुए मैंने एक सांप को देखा
वो गुजर रहा था सड़क के किनारे से
मैं डरी पर फिर तेजी से उसके पीछे गई
तो वो भी पलट के पूछ बैठा
क्या चाहती हो
मैंने कहा जरा रुको तो सही तुम्हारी एक तस्वीर लेना चाहती हूं
इतना जहर होने के बावजूद इतने खूबसूरत दिखाई पड़ते हो
ये अचंभा सबको दिखाना चाहती हूं
वो मुझ पर हंस दिया
कहने लगा भोली हो तुम
अपनी दुनिया में जाकर देखो इंसानों को
मैं तो कुछ नहीं हूं उनके आगे
मैं अपना जहर दौलत के लिए नहीं उगलता
ना उगलता हूं बेवजह किसी को छोटा महसूस करवाने के लिए
मेरा ज़हर मैंने खुद से नहीं चुना इंसानों की तरह
मैं बाहर से खूबसूरत इसलिए नहीं की अंदर छुपा सकूं मक्कारी इंसानों की तरह
मैं खामोश हो गई और वो चला गया
मैं सोचने लगी आज उस से मैंने कितना कुछ सीखा है
अब डर नहीं लगता सांपों से क्युकी उससे ज्यादा ज़हर मैंने इंसान में देखा है
-जया, विधि विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय।
सरहद पर जब बेटा हमारा चलता है।
उसके फर्ज से घर का गुजारा चलता है॥
घर से दूर किराए पे रहने वालों का
कई दुकानों पे महीनों उधारा चलता है
चांद भी उसकी खूबसूरती पे शर्माए
टूटकर जब भी कोई सितारा चलता है
बेटे उकताएं साल भर में मगर उम्र भर
बाप बेटे का बनकर सहारा चलता है
ऐ समंदर तेरी लहरों का मुझे खौफ नहीं
मेरी कश्ती के साथ ही किनारा चलता है
-नीरज राज, शोधार्थी, समाज शास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय।
इतनी भी क्या जल्दी है
बिखरा हुआ आसमान
यूं तो नहीं कहता कि- खुद भी बिखर जाओ।
इतनी भी क्या जल्दी है
हार मानने की,
जरा रुक तो जाओ।
मुड़कर देख तो लो
क्या पीछे छोड़ कर जा रहे हो,
इतनी भी क्या शिकायत जिंदगी से
कि सबका दिल तोड़ कर जा रहे हो।
बस एक बार इस खुले आसमान के नीचे
किसी अपने के सिरहाने
दर्द-ए-दिल बयान तो करो,
शायद फिर कोई अपना लगने लगे
जरा मन का बोझ हल्का तो करो।
जिंदगी केवल जीने के लिए है
अगर तू यह बात समझ जाएगा
तो यकीन मान
सारे दुख भूल कर
तुझे जीना आ जाएगा।
- निधि, अंग्रेजी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय।
मंच मांगता हूं ।
अपनों के बीच परायपन, इसका में दर्द जनता जनता हूं ।
अपना लो हिंदी को अब तो, हिंदी के सारे दंश मांगता हूं ।
बहुत कोशिश हुई, कमी नहीं थी प्रयासों में तुम्हारे ,
अंग्रेजी अपनाने में, हिंदी को ठुकराने में ,
बहुत खुशी होती तुम्हें, देश को नीचा दिखाने में,
शर्म क्यों आती है तुम्हें मातृ भाषा अपनाने में ,
जितना समय लगाया तुमने, अपनी जुबां को गुलाम बनाने में,
वो समय लगाया तुमने हिंदी का मान बढ़ाने में,
अंग्रेजी का प्रचार किया बड़ चढ़ कर,
हाथ दुखते है आज तुम्हारे, मातृभाषा का ध्वज उठाने में,
मस्तक्ष क्यो झुक जाता है तुम्हारा, हिंदी को राष्ट्रभाषा बताने में ।
- देवेंद्र, शोधार्थी, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय।
हिंदी के बिन प्रतिदिन बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख अधूरी है,
क्योंकि इसके लिए एक स्वदेशी राष्ट्रभाषा का होना बेहद जरूरी है।
जब एक संविधान, एक विधान, एक ध्वज और एक मुद्रा पर हम एक मत है।
तो हिंदी से जुड़े शक - शुबहे दूर कर एक मन से देश की भाषा बनाने पर क्यों नहीं सहमत है।
आज के समय की यह है अबुझ पहेली,
क्यों क्षेत्रीय भाषाओं की हिंदी बन ना पाई सहेली,
न जाने कब हम सब हिंदी को राष्ट्रभाषा, किसी विवाद बिन बताएंगे,
न जाने मातृभाषा के कब अच्छे दिन आएंगे।
हिंदी सूचना और संवाद की अघतन भाषा है,
हिंदी भाषा है ज्ञान - विज्ञान की ना की सिर्फ मनोरंजन की भाषा है।
जो भी भाषा सत्ता के भरोसे रही है,जमीनी स्तर पर कमजोर और अछूत हुई है,
जो लोक में बहुविध प्रयोग में रही है, वहीं फली - फूली और मजबूत हुई हैं।
हिंदी में विचारो की जगह सिकुड़ रही है,
जरूरत है वास्तविक मुद्दों पर लिखने वालो की, मनोरंजक लेखकों की आवश्यकता नहीं है।
अपने विचारों की दरिद्रता को कब तक छुपाएंगे,
छाप- छपाई और प्रस्तुति के आधार पर कब तक जरूरत रह पाएंगे।
हिंदी है भाषा संघर्षों वाली ये सबको बतलाना है,
न केवल लोकप्रिय, हिंदी को बौद्धिक विमर्शों वाली भाषा बनाना है।
हम ही पांव, हम ही कुल्हाड़ी, हम ही कठिन राह में पड़ने वाले वो पांव के छाले है।
हिन्दी के दुश्मन हम खुद हिंदी वाले है।
अपने ही घर में डाका डाले यहां सब चौर चिंदी है,
ना पंजाबी,ना गुजराती, ना ही कोई सिंधी है,
एक देश का वासी, हर हिंदुस्तानी हिंदी हैं।
- जतिन, विद्यार्थी, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग (द्वितीय वर्ष)
अखिल भारतीय जाट सूरमा स्मारक महाविद्यालय, रोहतक।
हिंदी हमारी अलंकार
हिंदी मेरी अपनी भाषा,
जिस को अपनापन ही भाता ,
हिंदी से सारा शृंगार है ,
हिंदी में ना कोई भेदभाव है ,
छोटी बड़ी मात्रा से ,
स्वर-व्यंजन का लगाव है ,
मातृ भाषा है जिसमें,
सर्वधर्म समभाव है।
हिंदी इतनी सहज कि ,
बसता इसमें संसार है ,
हिंदी के स्वर सहारा देते ,
व्यंजनों का बसाया संसार है ।
हिंदी में हम अपने भावो को ,
विवेकपूर्ण व्यवहार है पाते ,
ऊंच-नीच के भेदभाव को ,
हृदय से सबके मिटवाती ।
प्रगति करता देश चला ,
हिंदी के विस्तार से,
उन्नत वही जग होता ,
जिसकी अपनी भाषा है ।
पराये भी अपने हो जाते हिंदी के व्यवहार से,
विदेशों में भी नाम कमाती ,
ऐसा हिंदी का अलंकार है ,
मृदु भाषी होकर भरती शब्द-भंडार है ।
- वाणी सैनी, कक्षा बारहवीं, इंडस पब्लिक स्कूल, रोहतक।
हमारे भारत देश में
त्योहारों के साथ-साथ
भाषाओं को भी मान्यता प्राप्त है।
हमारे देश में बांग्ला ,तेलुगू ,
पंजाबी, उर्दू
भाषाओं का भी बोलबाला है
जिनमें हिंदी भाषा को
राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त है।
आज 14 सितंबर का दिन
हमारे लिए और हिंदी
भाषा के लिए बड़ा ही सुहावना दिन है ,
इसी भाषा के साथ ही देश
का मान -सम्मान बढ़ा है ।
बचपन से लेकर आज का जो
समय बीता है, वो हिन्दी भाषा में ही
बीता है, जिसके कारण ही यह भाषा
सभी भाषाओं से निराली
और न्यारी बन गई है ।
हमारी सभ्यता को हिंदी
भाषा ने ही बनाए रखा है ,
आज के युग में हिंदी
जनमानस की भाषा बन गई है ।
साथ ही हिंदी भाषा ने
ही हमारे साहित्य की
सुन्दरता निखारी है।
इसी भाषा में हम अपने
मन के भावों को
कलम से लिख पाते है और
दूसरों से साझा करते है ।
यही वो भाषा है जिसने
हमारे बीच की दूरी
को मिटाया है ।
यूं ही अपनी मातृभाषा हिंदी को
सदैव के लिए जीवंत रखा जाएं
और हिंदी दिवस का दिन
यूं ही प्रेम व शान
से मनाया जाएं।
- साक्षी, छात्रा, बीए द्वितीय वर्ष, वैश्य कॉलेज।
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