पैरा खेलों से वर्ष 2010 से जुड़ा हूं। पढ़ाई में रुचि कम थी। खेलों में अपनी प्रतिभा दर्शाते हुए डिस्कस थ्रो में कॉमनवेल्थ, ग्लॉस्को, इंडोनेशिया में देश का प्रतिनिधित्व किया और इन सभी में चौथा स्थान हासिल किया। रियो पैरालंपिक से पहले कंधे में चोट आ गई। इस कारण इसमें भाग लेने से वंचित रह गया। अब पावर लिफ्टिंग खेल में हिस्सा लेते हुए पैरालंपिक में जगह बनाई है। अमर उजाला से ही बातचीत में पैरा खिलाड़ी जयदीप ने अपना संघर्ष साझा किया। भैया कुर्ला रोड निवासी जयदीप ने बताया कि पढ़ाई में रुचि कम थी खेलों में अपने कॅरियर तलाशते हुए डिस्कस थ्रो खेल के जरिये आगे बढ़ा। पैरा खेलों की ओर दोस्त पैरा धावक जितेंद्र ने आकर्षित किया। डिस्कस थ्रो में बेहतर प्रदर्शन करते हुए कॉमनवेल्थ खेलों में चौथा स्थान पाया। वर्ष 2012 में हुए पैरालंपिक में छठा स्थान पाया। इसके बाद सीधे हाथ के कंधे में चोट आ गई। इस चोट ने डिस्कस थ्रो खेल ही नहीं रियो पैरालंपिक खेलों से भी वंचित कर दिया। वर्ष 2017 से अपना खेल बदला और डिस्कस थ्रो की जगह पावर लिफ्टिंग शुरू की। ग्लॉस्को में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में चौथा स्थान, इंडोनेशिया में हुए एशियन गेम्स में चौथा स्थान हासिल किया। पैरालंपिक कोटे में जगह बनाई। कोच चंद्र शर्मा की देखरेख में अभ्यास करते हुए यह सफलता हासिल की। अब टोक्यो में गोल्ड मेडल पर नजर है। घर में पिता समंदर सिंह सेवानिवृत्त हवलदार, छोटा भाई रेलवे में क्लर्क, बड़ी बहन के अलावा मां दिलवंती है। पैरालंपिक खेलों में शामिल होने पहुंची टीम से प्रधानमंत्री ने ऑनलाइन संपर्क किया। इस पार्टी में 54 प्रतिभागी शामिल है। उनसे अच्छा प्रदर्शन करने के साथ उनकी कहानी पूछी व हौसला बढ़ाया। साई बालगढ़ सोनीपत में एथलेटिक्स कोच के रूप में सेवाएं दे रहा हूं।