आंखों पर पट्टी बांधकर 10 कदम चलना मुश्किल भरा रहा। हर कदम पर गिरने या चोट लगने का डर लगा। ऐसे में दुखों से घिरे नेत्रहीनों के जीवन की समस्याओं का अंदाजा लगाना मुश्किल है। यह कहना था नर्सिंग छात्रा का। क्षेत्रीय नेत्र रोग संस्थान के सीनियन प्रोफेसर डॉ. अशोक राठी ने इस छात्रा को अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर दस कदम चलने का अनुभव साझा करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया था। यह सब केवल अपने नेत्रों की ज्योति खो चुके लोगों के जीवन के अंधेरे व दर्द को समझाने के लिए किया गया। नर्सिंग कॉलेज में शनिवार को नेत्रदान पखवाड़ा के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
यहां डॉ. अशोक राठी ने कहा कि नेत्रदान की आवश्यकता क्यों हैं, यह समझना जरूरी है। इसके बाद ही नेत्रदान या इसके प्रति जागरूकता का कदम उठा सकते हैं। नेत्रदान को हम कोर्निया की जरूरत कह सकते हैं। किसी एक व्यक्ति के दान किए गए नेत्रों से कम से कम हम दोनों लोगों के जीवन में रोशन भर सकते हैं। नई तकनीक से एक ही कोर्निया को एक से ज्यादा या दो लोगों को जरूरत के हिसाब से अलग-अलग लगा सकते हैं। यह केवल नेत्रदान से संभव है। आंखों के लिए कोर्निया किसी लैब या फैक्ट्री में बनाना असंभव है। यह केवल मरणोपरांत दान किए गए नेत्रों से ही प्राप्त होता है। नेत्रदान का आवेदन भरने वाले से अधिक उनके परिजनों को समझाना होता है। यही लोग नेत्रदान कराने में सहयोगी बनते हैं। संस्थान भी अब इसी ओर ध्यान दे रहा है।
डॉ. ज्योति ने कहा कि आंख में कॉर्निया ही देखने का काम करता है। इसलिए कॉर्निया ही सबसे अहम होता है। यही दान की गई आंख से निकाल कर किसी नेत्रहीन को लगाया जाता है। इसके बाद ही व्यक्ति देख पाता है। देखने से ही कोई व्यक्ति 80 प्रतिशत चीजों को सीख सकता है। साथ आंखों की रोशनी होने से उसका जीवन सरल हो जाता है। इसलिए हमें नेत्रदान के लिए आगे आने की जरूरत है। इस मौके पर नर्सिंग स्टाफ व अन्य लोग मौजूद रहे।