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वो एक एक कमरे की लॉक तोड़ते अंदर घुसते जा रहे थे, हमारा बचने का दायरा सिमटता जा रहा था...

Mon, 14 Mar 2016 02:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
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जाट आरक्षण - फोटो : भव्य नरेश
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पापा, मुझे घर की फोटो देखनी है, सब ठीक तो है न। मेरे खिलौने और किताबें सही सलामत हैं न। पापा एक अंकल मेरी साइकिल में आग लगाने की कोशिश कर रहे थे। प्लीज मुझे मेरी साइकिल की फोटो भेजो न पापा। ये फरियाद उस आठ साल के मासूम शाश्वत की है जो 19 फरवरी को वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु के घर सिंधु भवन के अंदर बचने की कोशिश कर रहा था, जब उपद्रव का तांडव मचाने वाले लोगों ने घर में आग लगा दी थी।
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आग चारों ओर फैल चुकी थी, पूरे घर में धुआं भर गया था। अंदर फंसे थे कैप्टन के बेटे शाश्वत और पत्नी एकता सहित परिवार के नौ सदस्य। आरक्षण और आंदोलन से अनजान शाश्वत आज रोहतक से बाहर सुरक्षित है लेकिन उसके दिलों दिमाग में घर कर गया है उसका उजड़ा घर और वो खौफनाक मंजर। वह बार-बार अपने पिता को फोन कर घर और अपनी किताबों की फोटो भेजने की फरियाद कर रहा है। लेकिन पिता दिखाएं तो क्या दिखाएं, किताबों का एक पन्ना भी घर में नजर नहीं आता। पिता ने बार-बार पड़ोस के घर की फोटो भेज बेटे को तसल्ली देने की कोशिश की लेकिन बेटा हर बार सवाल खड़े कर देता, ये घर हमारा नहीं...

आरक्षण की आग में रोहतक के झुलसने के तीन सप्ताह बाद कैप्टन अभिमन्यु की बहन दयावती, जीजा रामवीर, भाई व्रतपाल और कैप्टन के बचपन के दोस्त रामनिवास (एडीजी, हरियाणा सरकार) उस खौफनाक मंजर के बारे कुछ पूछते ही फफक कर रो पड़ते हैं। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने पूर्वजों और धरोहर के संग्रह सिंधु भवन को धू-धू कर जलते देखा। 
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मन ही मन सोच लिया था... मर जाएंगे अब, भगवान ही बचा सकते
कैप्टन की बहन दयावती और रामनिवास ने बताया कि दिल्ली बाईपास चौक से एमडीयू गेट तक 19 फरवरी को लगभग ढाई बजे दो तीन बार हजारों लोग इधर से उधर भाग दौड़ रहे थे। अचानक गोली चलने की आवाज आई। उसके बाद लगभग तीन बजे लोगों का हुजूम हमारे घर की ओर उमड़ पड़ा। गेट पर चार पुलिसकर्मी तैनात थे लेकिन उनमें से तीन हथियार वहीं डाल जान बचाकर भाग गए।

एक ने हिम्मत दिखाई और उपद्रवियों से भिड़ पड़ा। हुड़दंगियों ने उसकी इतनी पिटाई की है कि आज तक उसका शरीर पीला पड़ा है। आंधी की तरह लोग घर में घुस आए। घर के अंदर खेल रहे बच्चे इकट्ठा होकर एक कमरे में हो गए। उपद्रवियों ने पहले गार्ड रूम में तोड़फोड़ की फिर वहां रखे सिलेंडर से कारों में आग लगाई। दरवाजों के ऑटोमेटिक लॉक तोड़ उपद्रवी घर में घुस गए। एक कमरे से दूसरे कमरे में, हमारा बचने का दायरा सिमटता जा रहा था। वो सभी कमरों में पेट्रोल से भरी बोतल फेंक आग लगा रहे थे। मन में सोच लिया था, मर जाएंगे अब, भगवान ही बचा सकते हैं...

10/10 का दराज बनी सुरक्षा कवच, 9 फैमिली मेंबर्स उसमें घुस बचाई जान
दयावती 10 बाई 10 की दराज दिखाते हुए फिर रो पड़ती हैं। कहती हैं कि यही वो दराज है जहां परिवार के नौ लोग  शाश्वत, कैप्टन की पत्नी एकता, भतीजी शीना उर्फ स्मृति, 9 साल का भतीजा स्तव्य, भाई सत्यपाल की पत्नी अमिका, भाई देव की पत्नी सुमन, सुमन की आठ साल की बेटी साहिबा, भतीजा रोहित, रामनिवास छिपे थे। सभी कमरों में आग लगी थी। बच्चे बिल्कुल सहमे थे। हमें बच्चों की चिंता थी। दराज के दोनों तरफ अलमारी अड़ा दी, ताकि वे हमें देख न सकें। हम 25 मिनट तक वहीं जमे रहे फिर पीछे का दरवाजा तोड़ा और वहां से बचकर मुश्किल से बाहर निकले। 

कुछ दिनों में होनी थी बेटी शीना की शादी, फिलहाल सपनों की हो गई बर्बादी
दयावती ने बताया कि बड़े भाई व्रतपाल की बेटी शीना की कुछ दिनों में शादी होनी थी। 19 को घर जलाया गया, 20 को दिल्ली में शादी के सिलसिले में ही रस्म कार्यक्रम था। सारा सामान उसी घर में था। सब कुछ जलकर राख हो गया। घबराई शीना इसका जिक्र आने पर फफक पड़ती है।

11000 किताबें क्यों जला दी... लूट ले जाते, किसी के काम तो आते
घर के अंदर मौजूद पार्क में एक यज्ञशाला है। उसमें आर्य समाजियों के बैनरों और तस्वीरों से भरपूर एक लाइब्रेरी भी है जहां वेदों समेत 11000 किताबों का संग्रह था। आग में ये सब कुछ जल गया। आगजनी के कई दिन बाद कैप्टन के बड़े भाई ब्रतपाल ने घर आकर ये मंजर देखा तो पिता स्व चौ. मित्रसेन आर्य के संजोए यज्ञघर और किताब घर को जला देख उनके मुंह से बस इतना निकला.. इतनी किताबें क्यों जला दी, लूट ले जाते, किसी के तो काम आते।

परिवार की संजोई सदियों की यादें भस्म हो गई
कैप्टन के दादा, परदादा और पिता की छड़ी, घड़ी, चश्मा जैसी यादगार चीजें भी कमरों की दीवारों में टंगी थी। दयावती और उनके पति राजवीर बताते हैं कि यज्ञ घर के फर्श के नीचे ग्रंथों और पूर्वजों का इतिहास गड़ा था। सभी फैमिली मेंबर्स ने हस्ताक्षर कर उस बक्से को इस सोच के साथ वहां गड़ा था कि जब कभी दुनिया खत्म हो तो खुदाई में ये सामान मिले। लेकिन सब कुछ उखाड़कर जला दिया गया। दादा की वो यादगार छड़ी और गड़ा सामान कहां मिलेगा।

60 कॉल किए, आगजनी के एक दिन बाद भी नहीं मिली सुरक्षा, दोबारा पहुंच उपद्रवियों ने घर में फिर लगाई आग
दयावती और रामनिवास कहते हैं कि उनके पास रिकॉर्ड है, एसपी, डीसी को 60 से ज्यादा कॉल किए और सुरक्षा की गुहार लगाई लेकिन उनका जवाब आता था जल्द भेज रहे हैं। आगजनी के एक दिन बाद तक भी वे नहीं आए। हां, उपद्रवी दोबारा बचाखुचा सामान जला कर जरूर चले गए। इसकी शिकायत उन्होंने जांच कमेटी से की है।

घरों के प्लेटनेम से हटे सरनेम...
आंदोलन के दौरान उपजे जातिगत बीज ने अंकुर लेना शुरू कर दिया है। सेक्टरों में कई घरों के लोगों ने नेमप्लेट से अपना सरनेम हटा दिया है। कैप्टन के करीबी यशपाल कहते हैं कि आंदोलन के दौरान जात पूछकर निशाना बनाया जा रहा था। यह भविष्य के लिए बहुत खतरनाक संदेश है। दयावती कहती हैं कि सेक्टर में कई शादियां सिर्फ इसिलए टूट गई हैं कि लड़का रोहतक का है। रोहतक में जो दाग लगे हैं उसे धो पाना मुश्किल है।
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