डॉ. सिद्धार्थ आर्य ने बताया कि नशे के लिए बार-बार इंजेक्शन का प्रयोग होता है। इससे हाथ, पैर की नसों के साथ जांघ की नसें भी पंक्चर हो जाती हैं। इंजेक्शन लगाने वाला स्थान कपड़े से ढका होने के कारण घरवालों की नजर से बच जाता है। जब स्थिति बिगड़ती है तब जानकारी मिलती है। कई बार इंजेक्शन इस तरह लगाए जाते हैं कि शरीर का अंग काला पड़ जाता है।
15 से 25 साल के किशोर और युवा ज्यादा हो रहे हैं नशे का शिकार
डॉ. आर्य ने बताया कि वर्ष 2019 में बंगलूरू में ऐसे मरीजों का उपचार किया था और अब रोहतक पीजीआई में ऐसे मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं। यहां महम क्षेत्र के मरीजों की संख्या अधिक है। दवा से नशा करने वाले युवकों का एक ग्रुप बना हुआ है। पीजीआई के एक्सपर्ट ने बताया कि उनके पास ऐसे मरीज आ रहे हैं जो नशा छोड़ना चाहते हैं, लेकिन आदी होने के कारण ऐसा कर नहीं पा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह का नशा करने वालों में काला पीलिया होने का 50 फीसदी और एचआईवी होने का 15 प्रतिशत खतरा बढ़ जाता है।
दवा नहीं घुली तो हो सकता है हार्ट अटैक
पीजीआई के एक विशेषज्ञ ने बताया कि दवा की टेबलेट को पीसकर सैलाइन वाटर में पीसना खतरे से खाली नही है। शरीर की नसें अधिक महीन होती हैं और इसमें कोई बड़ा पार्टिकल यदि जाता है तो ये ब्लॉक हो सकती हैं। यह ब्लाॅकेज हार्ट अटैक या ब्रेन स्ट्रोक का कारण बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि इंजेक्शन से किसी भी प्रकार के नशे से बचा जाए। साथ ही इन दवाओं की उपलब्धता किसी के लिए आसान नहीं होनी चाहिए।
काउंसिलिंग का सहारा
डॉ. सिद्धार्थ ने बताया कि राज्य व्यसन निर्भरता उपचार केंद्र में आने वाले युवाओं को काउंसिलिंग के जरिए इस तरह के नशे से बचाया जा रहा है।