रोहतक। नाइजीरिया से बंधनमुक्त होकर लौटे रोहतक के आसन गांव के अंकित ने समुद्री डाकुओं के संबंध में कई खुलासे किए हैं। बताया कि अधिकतर समुद्री डाकू सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल करते है। नाइजीरिया के ही रहने वाले गिरोह के सरगना अल्फा मामूसा के कहने पर ही अपहरण से लेकर रंगदारी और फिरौती मांगने की वारदात को अंजाम दिया जाता है। गिरोह के सरगना के कहने पर ही अंकित और चार अन्य भारतीय के साथ न सिर्फ मारपीट की जाती थी बल्कि सभी को उसके कहने पर ही गोली मारी गई थी।
अंकित हुड्डा ने मुंबई से फोन पर बताया कि समुद्री डाकू हर समय मास्क या कपड़ा मुंह पर ढांप कर रखते हैं ताकि उन्हें कोई पहचान न सके। खास बात यह है कि समुद्री डाकुओं की उम्र 20 से लेकर 40 साल के बीच है। कई डाकुओं ने लंबी लंबी दाढ़ी भी रखी है। हर डाकू के पास दो से अधिक फोन थे। इनमें कुछ एंड्रायड फोन का भी इस्तेमाल कर रहे थे। बताया कि नाईजीरिया और मुंबई के कई दलाल भी डाकुओं के संपर्क में हैं। उन्हीं के कहने पर अक्सर शिप में सवार भारतीय का अपहरण किया जाता है।
भारतीय के दिखते ही करते है मारपीट
अंकित ने बताया कि डाकू भारतीय के दिखते ही मारपीट करनी शुरू कर देते है। वह आवाज और शक्ल से भारतीय को पहचान लेते है। सबसे पहले मोबाइल और रुपये लूटे जाते है। इसके बाद ही मारपीट की जाती है।
यह था मामला
घाना से नाईजीरिया जा रहे शिप एमटी अपेक्स आईएमओ का 19 अप्रैल को आईलैंड के पास समुद्री लुटेरों ने अपहरण कर लिया था। उस समय शिप पर 15 लोग सवार थे। इसमें रोहतक के आसन गांव निवासी अंकित हुड्डा समेत पांच भारतीय थे। परिजनों को अंकित के अपहरण की जानकारी 24 अप्रैल को शिप के थर्ड ऑफिसर संदीप चौधरी की पत्नी के माध्यम से मिली थी। इसके बाद परिजनों ने दिल्ली में तत्कालीन विदेश मंत्री मंत्री सुषमा स्वराज से गुहार लगाई थी। सरकार तभी से भारतीय मूल के कर्मचारियों को बंधनमुक्त कराने के प्रयास में लगी हुई थी। दो माह आठ दिन बाद वीरवार को समुद्री लुटेरों ने पैसे लेने के बाद अंकित को बंधनमुक्त कर दिया।
सेटेलाइट फोन में हर जगह आते हैं सिग्नल
साइबर एक्सपर्ट विकास कुमार के अनुसार सेटेलाइट फोन या सेटफोन ऐसा मोबाइल फोन होता है जो लैंडलाइन या सेल्युलर टॉवरों के बजाय उपग्रहों से सिग्नल प्राप्त करता है। सेटफोन्स का फायदा ये है कि वह किसी भी स्थान से फोन कॉल कर सकते हैं, चाहे वह सहारा मरुस्थल हो या एवरेस्ट की चोटी या फिर अफ्रीका के घने जंगल। मतलब, यह जमीन, हवा या पानी में कहीं भी संकेत पकड़ सकता है। सेटफोन का नुकसान बातचीत में आने वाली अड़चन के रूप में होता है, क्योंकि सिग्नल को उपग्रह तक पहुंचने और लौटकर आने में समय लगता है। इसके अलावा, सेटेलाइट के जरिये इस्तेमाल होने वाला खर्च भी सेल्युलर फोनों की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। हालांकि यह कमियां सेटफोन के फायदों के सामने नगण्य साबित होती हैं। किसी आपदा की सूरत में यह दुनिया के दूर-दराज इलाकों में ऐसे समय संपर्क साध सकते हैं, जब अन्य संचार साधन जवाब दे जाते हैं।