जर्जर हुई कॉलेजों की शिकायत पेटियां खाली, बेटियों का उत्पीड़न जारी
- यौन उत्पीड़न मामलों में कार्रवाई को लेकर कालेजों में लगाई गई थी शिकायत पेटियां
- छात्राएं इन पेटियों में डाल सकती थी बगैर नाम की शिकायतें
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक। बेटियों का यौन उत्पीड़न रुकने का नाम नहीं ले रहा है। खुद को अनसेफ बता रही बेटियां रोहतक में रहना तक नहीं चाहती हैं। उनकी सुनवाई और शिकायत पर कार्रवाई नहीं होना इसकी बड़ी वजह है। यौन उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर करने व पीड़िताओं को न्याय दिलाने के लिए कालेजों व विश्वविद्यालयों में लगाई गई शिकायत पेटियां जर्जर हाल हैं। कहीं पेटियां गायब हैं तो कहीं इन पर ताला नहीं है। ऐसे में बेटियां अपनी शिकायत करें भी तो कैसे। जबकि हर दिन उन्हें कालेज से घर पहुंचने तक 30 से 50 कमेंट सुनने को मिलते हैं। भीड़ में मनचले उन पर हाथ डालने से भी बाज नहीं आते हैं। ऐसे में बेटियों की सुरक्षा का मुद्दा बड़ा बन जाता है। अमर उजाला ने बेटियों से सुरक्षा के मुद्दे पर बात की तो यह सच सामने आया। यही नहीं कालेजों की शिकायत पेटियां जांची तो ये भी जर्जर हाल मिलीं।
बगैर ताले एक कील पर लटकी है शिकायत पेटी
पंडित नेकीराम शर्मा राजकीय महाविद्यालय में बेटियों के यौन उत्पीड़न की शिकायत पेटी जर्जर हाल है। दीवार पर एक कील के सहारे झूल रही पेटी को अरसे से किसी ने हाथ भी नहीं लगाया है। शिकायत पेटी को दीवार पर रोकने वाली एक कील निकल जाने से यह दूसरी कील पर टेढ़ी लटकी है। यही नहीं इस पर ताला तक नहीं लगा है। ऐसे में पेटी में शिकायत आने का मतलब ही नहीं बनता। शिकायत आई भी तो कोई भी उसे निकाल सकता है। जबकि इसके लिए कॉलेज प्रशासन की ओर से व्यक्ति विशेष को जिम्मेदारी दी जाती है। यही रोजाना शिकायत पेटी का ताला खोल कर उसमें आने वाली शिकायतों को निकालता है और उनका निवारण करता है।
कॉलेज स्तर पर निपटा रहे शिकायतें
राजकीय महिला महाविद्यालय में शिकायत पेटी नजर ही नहीं आई। बाद में प्राचार्य इसे अपने कार्यालय के बाहर होने का दावा करते हुए इसमें मुश्किल से एक-दो शिकायत ही कभी कभार आने की बात कही। ये भी सामान्य शिकायतों वाली होती हैं। इनका कालेज स्तर पर ही समाधान कर दिया जाता है। जबकि सबसे ज्यादा दिक्कतें यहीं की छात्राओं के सामने आती हैं। कालेज में ज्यादातर छात्राएं दूर दराज के गांवों से आती हैं। बसों में मनचले इन्हें परेशान करते हैं। सड़क पर पैदल चलना तो इनके लिए सजा सरीखा रहता है। इन सबको कमेंट की तरह सहते हुए बेटियां आगे बढ़ती रहती हैं।
केस 1 :
रोज हो रहा बेटियों का उत्पीड़न
बेटियों का उत्पीड़न रोज हो रहा है। छेड़छाड़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए कॉलेजों में शिकायत एवं सुझाव पेटियां लगाने का दावा किया जाता है। हकीकत में ये पेटियां जर्जर पड़ी हैं। महिला महाविद्यालय में छह हजार से अधिक छात्राएं पढ़ती हैं। यहां शिकायत एवं सुझाव पेटी लगी होने की छात्राओं को जानकारी ही नहीं। एक पेटी कॉलेज प्राचार्या के कमरे के बाहर है। यहीं सीसीटीवी भी है। इस कारण छात्राएं यहां शिकायत डालने से घबराती हैं। यह पेटी भी शायद ही कभी खुली हो। दूर गांव से आने वाली लड़कियों को लगातार उत्पीड़न सहना पड़ रहा है।
- गीता, छात्रा।
केस 2 :
मंदसौर सरीखी घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं। बेटियां सुरक्षित रहें। यह सवाल अहम बन जाता है। जब भी ऐसी घटना सामने आती है, सरकार नियम व कानून सख्त करने के साथ नई योजनाएं लागू करने का दावा करती है। कालेजों व शिक्षण संस्थानों में शिकायत एवं सुझाव पेटियां लगाना भी इसमें शामिल है। शहर में हुए नेपाली युवती कांड के बाद कॉलेजों व विवि में लगाई गई पेटियां अब जर्जर हाल हैं। एमडीयू के हॉस्टल में एकमात्र शिकायत पेटी है। इसे भी पिछले सात महीने में कभी खुलते नहीं देखा। कैंपस में लड़कियों से छेड़छाड़ की घटनाएं होती रहती हैं। इन घटनाओं की शिकायतें सुझाव पेटी तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
इंदु, छात्रा।
केस 3 :
बेटियां रोज उत्पीड़न झेल रही हैं। मनचले उन्हें परेशान करते हैं। इस बारे में शिकायत करें तो पढ़ाई छूटने का डर रहता है। बेटियां कालेज में किसे कहें या कहां शिकायत दें, इसकी जानकारी ही नहीं होती। शिकायत पेटी नाम की चीज से वे अनजान हैं। इस बारे में कोई बताने वाला भी नहीं है। छात्राओं को सुरक्षा के लिए शिकायत पेटी या अन्य जरूरी बातों के बारे में बार-बार बताया जाना चाहिए। इस तरह की कमेटी में महिला शिक्षकों के साथ सीनियर छात्राओं को भी शामिल करना चाहिए। ऐसा नहीं होने कारण लड़कियों को रोजाना मनचलों की कमेंट सुनने पड़ते हैं।
अनीता, छात्रा।
केस 4 :
कालेजों व विश्वविद्यालयों में शिकायत पेटियां खानापूर्ति के लिए रख दी जाती हैं। छात्राओं को इसके बारे में न तो बताया जाता है न ही इसकी जानकारी दी जाती है। इस कारण छात्राओं की रुचि भी इस ओर नहीं रहती। कोई छात्रा इन पेटियों में शिकायत डाल भी दे तो महीनों तक इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। शिकायतों पर किसी तरह नजर पड़ी तो कारवाई के नाम कुछ नहीं होता। बस, ले देकर शिकायतकर्ता पर समझौते का दबाव बनाया जाता है। इस कारण ज्यादातर महिलाएं उत्पीड़न सहने को मजबूर हैं। वे सारी जिंदगी बोल ही नहीं पाती हैं। इसके लिए सरकार को बेहतर व्यवस्था बनानी चाहिए।
किरण, छात्रा।
कॉलेज में दो शिकायत एवं सुझाव पेटियां हैं। इन पेटियों को समय समय पर चैक करते हैं। छात्राओं की समस्याओं का समाधान समय रहते किया जाता है। समस्याओं के समाधान के लिए कॉलेज में शिक्षकों की कमेटी के साथ 20 छात्राओं की एक कमेटी भी बनाई गई है।
- आशा अहलावत, प्राचार्य, राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय।
शिकायत पेटी लगी हैं। इनमें शिकायतें नहीं आ रही है। इसकी वजह छात्राओं की समस्या पर तुरंत कार्रवाई करना है। छात्राएं सीधे शिकायत लेकर आती हैं। इनका तुरंत समाधान किया जाता है।
- डॉ. राजेश धनखड़, चीफ वार्डन, गर्ल्स हॉस्टल, एमडीयू।