रोहतक। जीना क्या उनका जो अपने लिए जिएं, जीना तो उनका ही जो गैरों के लिए जिएं। रोहतक के गोहाना अड्डा क्षेत्र की रहने वाली जिया वाही ने इस बात को आत्मसात कर लिया है। 15 वर्ष की आयु खेलने-खाने यानी उन्मुक्त होकर जीवन जीने की समझी जाती है। पर जिया की संवदेनशीलता और समर्पण की कहानी मोबाइल फोन और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते पथविमुख हो रहे युवाओं को राह दिखाती है।
दान ने दिलाई पहचान
जरूरतमंदों की मदद करना अमित और तृप्ता वाही की लाडली जिया का शुरू से ध्येय रहा है। जन्मदिन या तीज-त्योहार मनाने के लिए लोग होटल या घर पर आयोजन करते हैं पर वह ऐसे अवसरों पर अपनी खुशी को आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के साथ साझा करती हैं। पॉकेटमनी और मिले उपहारों से वह समय-समय पर खाद्य सामग्री के अलावा कपड़े और अध्ययन सामग्री दान कर वंचितों के चेहरों पर मुस्कान लाने का कार्य करती हैं। वह कोरोना काल में मानव सेवा में जुटी रहीं । वर्ष 2021 में तो एक संस्था को कैंसर पीड़ितों के लिए अपने बाल दानकर मिसाल बन गईं।
पर्यावरण संरक्षण की जगा रही अलख
आज के दौर में प्रदूषण गंभीर मुद्दा है। जिया इसे भली-भांति समझती हैं। वह रोहतक बाइसकिल क्लब (आरबीसी) की सदस्या हैं। संगठन की ओर से पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से होने वाले जागरूकता कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी सबसे पहले रहती है।
समझें औरों का दर्द, निभाएं मानवता का फर्ज:
जिया ने एक बार चोटिल कबूतर देखा। बेजुबान की पीड़ा बालमन में घर कर गई। घायल जीव का इलाज कराकर उसे नवजीवन दिया। जिया बताती हैं उसी दिन उन्होंने ठान लिया लिया कि किसी भी माध्यम से सेवा का अवसर मिले, वह पीछे नहीं हटेंगी। सच्ची मानवता भी यही है कि आप किसी जरूरतमंद की मदद करें। पीड़ा के समय सहारा बनें। आज वह सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए जरूरतमंद बच्चों को पेंटिंग, डांस सिखाने के साथ शिक्षित बनाने की मुहिम में जुटी हैं।
ये पुरस्कार मिल चुके
-कोरोना योद्धा अवॉर्ड
-हरियाणा अवॉर्ड
-हरियाणा गौरव अवॉर्ड
-ह्यूमन वैल्यू अवॉर्ड
मां से मिली समाजसेवा की सीख
समाजसेवा की सीख जिया को अपनी मां तृप्ता वाही से मिली। वे खुद सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 10वीं कक्षा की छात्रा जिया कहती हैं वह भविष्य में चिकित्सा या शिक्षा के क्षेत्र को चुनेंगी। उन्हें लगता है स्वास्थ्य सेवाओं और लड़कियों की शिक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं, अभी और सुधार की जरूरत है।