रेवाड़ी। पंजाब, गुजरात, राजस्थान में लंपी चर्म रोग वायरस के मामले सामने आने के बाद हरियाणा सरकार अलर्ट मोड पर आ गई है। ऐसे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के निर्देश पर मुख्य सचिव संजीव कौशल ने शनिवार को राज्य के सभी उपायुक्तों, पुलिस अधीक्षकों एवं पशुपालन विभाग के अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के माध्यम से प्रदेश में गोवंश में फैले लंपी चर्म रोग (गांठदार रोग) के नियंत्रण एवं प्रभावी रोकथाम के बारे में चर्चा की। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को प्रदेश से बाहर पशु भेजने और लाने पर तुरंत रोक लगाने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि टीकाकरण कार्य को तेजी से पूरा किया जाए और पशु चिकित्सक गोशालाओं में नियमित तौर पर इस रोग को लेकर विशेष निगरानी रखें। ऐसा मामला प्रकाश में आते ही उसकी जानकारी जल्द राज्य मुख्यालय को देने के साथ जरूरी कदम उठाए जाएं। वीसी के बाद यहां उपायुक्त अशोक कुमार गर्ग ने मातहत अधिकारियों की एक बैठक बुलाकर उनको इस मामले में जरूरी निर्देश देते हुए कहा कि जिले के पशुपालकों को लंपी चर्म रोग के वायरस को लेकर जागरूक किया जाए। ताकि पशुपालक सावधानी बरते हुए गोवंश की जीवन रक्षा कर सकें। उन्होंने गोवंश पालकों से कहा कि वे घबराए नहीं और पशु चिकित्सकों की ओर से मिले निर्देश का पालन करें।
इस दौरान उपायुक्त अशोक गर्ग ने जिले की सभी गोशालाओं में गोवंशों को लंपी से बचाव के लिए टीकाकरण कार्य पूर्ण कराने और इसकी रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री खुद इस कार्य पर नजर रखे हुए हैं। डीसी ने पशुपालन विभाग को जिले की सभी गोशालाओं में जल्द फॉगिंग करा लेने और पुलिस विभाग को जिले में नाके लगाने के लिए निर्देश देते हुए कहा कि मौजूदा हालात में पशु मेलों के आयोजन एवं पशुओं की आवाजाही पर रोक लगाने के लिए कहा है। इसके साथ ही जिले की सभी गोशालाओं व राजस्थान के साथ लगते गांवों में प्राथमिक आधार पर लंपी रोधी टीकाकरण करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
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लंपी चर्म रोग
लंपी चर्म रोग (एलएसडी) एक वायरल रोग है। यह वायरस केप्रिपॉक्स, जो पॉक्स परिवार का वायरस है। रोग मुख्य रूप से गोवंश को प्रभावित करता है। यह गांठदार त्वचा रोग गोवंशीय एवं भैंसवंशीय पशुओं का एक संक्रामक रोग है। यह एक गैर-जूनोटिक रोग है, जो पशुओं से इंसानों में नहीं होता है। रोग के कारण पशुओं में होने वाली मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक हो सकती है। इस रोग से प्रभावित पशु में आरंभ में बुखार, आंख से पानी आना, नाक से साव आना, चलने - फिरने में अनिच्छा, लार गिरना तथा दूध उत्पादन अचानक से घटना, जैसे लक्षण नजर आते हैं। बाद पशु के पूरे शरीर पर या विशेषकर सिर, गर्दन, छाती और थनों के आस - पास एवं पैरों में रोग के विशिष्ट लक्षण के रूप में कठोर गोल उभार बन जाते हैं, जो 2 से 5 सेंटीमीटर व्यास के हो सकते हैं। गादी, छाती, गले के नीचे और पैरों में सूजन आ सकती है। इन उभारों से मवाद आने और त्वचा पर घाव हो जाने जैसी स्थिति भी बन सकती है।
रोग फैलने के कारण
रोगी पशु से अन्य स्वस्थ पशुओं में रोग का प्रसार रक्त चूसने वाले अथवा काटने वाले कीटों, जैसे मच्छर काटने वाली मक्खी, जूं चींचड़े एवं मक्खियों आदि से होता है। यह रोग रोगी पशु के संपर्क से, लार से गांठों के मवाद / जख्म से सक्रमित चारा / पानी से फैलता है। यह रोग पशुओं के आवागमन से फैलता है।
पशुओं को रोग से बचाने के लिए ये करें पशुपालक
गोवंशीय एवं भैंसवंशीय पशुओं के इस संक्रामक रोग के नियंत्रण एवं रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय, स्वस्थ पशुओं को संक्रमण की चपेट में आने से बचाना है। पशुओं के बाड़े में मच्छर काटन वाली मक्खी, जू चींचड़े एवं मक्खियों आदि को नियंत्रित करें। पशुओं के बाहय परजीवियों की रोकथाम हेतु पशु चिकित्सक की सलाह पर परजीवी नाशक दवाओं का उपयोग करें। पशु आवास एवं उसके आस-पास साफ-सफाई एवं स्वच्छता पर लगातार ध्यान दें।
पशु आवास के नजदीक पानी, मल-मूत्र एवं गंदगी एकत्र नहीं होने दें। किसी भी पशु में रोग के आरंभिक लक्षण दिखाई देते ही उसे अन्य स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग कर दें। पशुओं को यथासंभव घर पर ही बांध कर रखें तथा अनावश्यक रूप से उसे बाहर नहीं छोड़ें। स्वस्थ / रोगी पशुओं को चराई के लिए चारागाह या बाहर ना छोड़ें। रोग ग्रस्त होने पर पशु को घर में पृथक स्थान पर रखें। किसी भी स्थिति में खुला ना छोड़ें। यह रोग के फैलाव का बड़ा कारण हो सकता है। रोग से सक्रमित पशुओं की देखभाल करते समय सभी आवश्यक जैव-सुरक्षा, जैसे दस्ताने, फेस मास्क, साबुन एवं सैनिटाइजर का भी नियमित उपयोग करें। पशु बाड़े अथवा आवास के प्रवेश पर चूने की दो फुट चौड़ी पट्टी बनाएं। यदि संभव हो तो रोगी पशुओं की देखभाल करने वाला व्यक्ति स्वस्थ पशुओं के समीप नहीं जाए। यदि यह संभव नहीं हो तो स्वस्थ पशुओं की देखभाल पहले करें एवं अंत में समस्त जैव-सुरक्षा उपायों के साथ रोगी पशु की देखभाल करें। रोग से सर्वमित परिसर, वाहन आदि को नियमित अंतराल पर सोडियम हाइपोक्लोराइट के 2 से 3 प्रतिशत घोल अथवा अन्य उपयुक्त रसायनों की ओर से विसंक्रमित करें। पशु उपचार नजदीकी राजकीय पशु चिकित्सक की सलाह से ही कराएं। रोगी गाय के दूध का उपयोग कम से कम दो मिनट तक उबाल कर ही किया जाए। रोगी पशु को संतुलित आहार, हरा चारा, दलिया, गुड़, बांटा, लीवर टोनिक आदि खिलाएं। ताकि पशु में रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि हो सके।
कोट
लंपी चर्म रोग को लेकर जिले में गोवंशों पर निगरानी जारी है। 14 गोशालाओं को देखते हुए 14 पशुचिकित्सकों की टीमें बना दी गई हैं। ये टीमें दिन में चार बार एक गोशाला में जाएंगी। पशुपालकों से आग्रह है कि अगर किसी गोवंश में इस बीमारी का लक्षण नजर आता है तो जल्द पशुपालन विभाग को सूचना दें। साथ ही पशुओं का दूध उबालकर ही पीएं।
- डॉ. राजबीर सिंह यादव, एसडीओ पशुपालन विभाग रेवाड़ी।
लंपी की रोकथाम के लिए जिले में धारा 144 लागू
रेवाड़ी। जिलाधीश अशोक कुमार गर्ग ने पशुओं को लंपी चर्म रोग से बचाने और बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए जिले में धारा 144 लागू कर पशु मेलों के आयोजन और पशुओं को जिले से बाहर लाने और ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
जिलाधीश द्वारा जारी आदेशों में कहा गया है कि लगातार पशुओं को लंपी के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिन प्रतिदिन बीमारी रोग फैलता जा रहा है। इसको देखते हुए प्रदेश सरकार ने सावधानी बरतने के आदेश दिए हैं। संवाद