हुंकार थमी, प्रचार रुका, अब मौन खड़ा गलियारों में,
सबकी किस्मत बंद पड़ी है, लोहे की दीवारों में।
वो भीड़, वो नारे, वो वादे, अब यादों का हिस्सा हैं,
ईवीएम के भीतर कैद हुआ, अब हर प्रत्याशी का किस्सा है।
कल तक जो ऊंचे स्वर में, अपनी साख बताते थे,
आज वही सन्नाटे में, मन की धड़कन गिनते जाते हैं।
तेरह मई की भोर नई, जब सूरज दस्तक देगा,
जनता का वो गुप्त फैसला, तब आकार ये लेगा।
चेयरमैन की गद्दी हो, या पार्षद का अधिकार,
किसके हिस्से जीत आएगी, किसका टूटेगा अहंकार।
ताला खुलेगा किस्मत का, और पिटारा बोलेगा,
जनता का वो एक-एक वोट, अब सरेआम ये तौलेगा।
हार मिले या जीत मिले, पर नगर नहीं ये हारना चाहिए,
जो भी बैठे सिंहासन पर, उसे शहर संवारना चाहिए।
रेवाड़ी और धारूहेड़ा के, चौराहों की प्यास बुझे,
विकास की जो धुरी घूमे, बस वही डगर अब सूझे।
गढ़ीमन की कलम पुकार रही स्वीकार करो जनादेश को,
विजयी होकर भी मत भूलना, अपने पावन संदेश को।
लोकतंत्र की इस परीक्षा में, हर नागरिक की ही जय हो।
कल खुलेगा बंद पिटारा, कल भाग्य का ताला टूटेगा,
देखना है किसके आंगन में, खुशियों का सूरज फूटेगा।
-मनोज वशिष्ठ, शिक्षाविद साहित्यकार