काल के कपाल पर, अंकित जो प्रश्न हैं,
दिख रहे समाज में, धुंधले से दृश्य हैं।
स्वार्थ की ढलान पर, फिसल रहा विवेक है,
भीड़ तो अपार है, पर मनुष्य एक है।
रेवाड़ी की वीर-माटी, शौर्य का प्रमाण है,
किन्तु आज मौन खड़ा, हर एक समाधान है।
धारूहेड़ा की प्रदूषित, वायु जो कराहती,
क्या विकास की डगर, यही अंत चाहती?
पद, प्रतिष्ठा, डिग्रियाँ, बस शीश का श्रृंगार हैं,
बिना चरित्र के ये सब, व्यर्थ और भार हैं।
शिखर वो नहीं जो बस, ऊंचाइयों को छू सके,
शिखर वो जो गिरतों को, थामने को झुक सके।
वोट के बाजार में, ईमान को बचाना तुम,
नशे और नोट के, प्रलोभन को हराना तुम।
जाति-पाति की दरारें, जो देश को बांटती,
चेतना की धार ही, उसे है आज काटती।
परिवर्तन की नींव का, तुम ही तो हो राज।
कलम से, विचार से, तुम भाग्य को संवार दो,
नगर के नवनिर्माण को, नया एक विस्तार दो।
मनोज वशिष्ठ,
शिक्षाविद साहित्यकार, सावित्री सदन विकास नगर