रेवाड़ी। रखरखाव के अभाव में 28 से 36 फीसदी बच्चों के दूध के दांतों में कीड़े लग जाते हैं जिसमें एक तिहाई बच्चों में रैम्पैंट कैरीज भी देखी गई है। यह बात स्कूलों में लगे स्वास्थ्य कैंपों में सामने आई।
जिले में 1 से 15 सितंबर तक स्वास्थ्य का पखवाड़ा मनाया जा रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीहा के बाल दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेंद्र मिश्रा ने बताया कि आजकल प्राय: देखने को मिल रहा है अधिकांश माता-पिता बच्चों के दूध के दांतों को उतना महत्व नहीं देते, जितना उन्हें देना चाहिए। स्कूलों में लगाए गए कैंप में पता चला कि 28 से 36 फीसदी बच्चों के दूध के दांतों में कीड़े लगे होते हैं जिसमें लगभग एक तिहाई बच्चों में रैम्पैंट कैरीज भी देखी गई है। रैम्पैंट कैरीज में ज्यादातर दूध के दांत बहुत तेजी से खराब होते हैं जिसका एक कारण अभिभावकों में इस विषय में कम जानकारी होना पाया गया है।
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कई बार दंत चिकित्सक के पास अभिभावक अपने बच्चों को लेकर आते हैं और कहते हैं कि जब से इसका दांत निकला है तब से ऐसा ही है। समय से ना ध्यान देने की वजह से वह दांत खराब हो जाता है। अभिभावकों को ऐसा लगने लगता है कि दांत खराब निकला था। दूध के दांत हमारे मुंह में 6 महीने से आना शुरू हो जाते हैं और 6 वर्ष की आयु में यह पक्के दांतों से रिप्लेस होने लगते हैं 13 से 14 वर्ष की आयु तक हमारे मुंह में सभी पक्के दांत आ जाते हैं। बच्चों के अभिभावकों से जब पूछा गया तो उनमें से ज्यादातर ने इस बात पर सहमति जताई कि रात में बच्चों को सुलाने के लिए बच्चा चीनी वाले दूध की बोतल मुंह में लेकर ही सोता है।
उन्होंने बताया कि दांतों की सुरक्षा के लिए दिन में दो बार ब्रश करना चाहिए। मीठी चीज खाने के बाद कुल्ला करें। माताएं बच्चों को दूध की बोतल मुंह में रखकर सोने के लिए ना प्रेरित करें। चीनी का अत्यधिक प्रयोग ना करें। 6 महीने पर एक बार परामर्श अवश्य लें।