पानीपत। अंसल की तर्ज पर जिस तरह टीडीआई सेक्टर 23 की अनिर्धारित यानी यूडीलैंड बेची गई है उसमें कुछ हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। ये प्लॉट टीडीआई के लेआउट प्लान में ही नहीं थे। इस यूडीलैंड पर अनिर्धारित भूमि के बिना लेआउट प्लान के ही जबरन और जालसाजी से प्लाॅट बना दिए गए। जबकि ये अनिर्धारित भूमि केवल हरियाली के लिए ही आरक्षित होती है। इसमें साथ लगने वाले प्लाट के आसपास बची जमीन को प्लॉट बनाया गया। इसकी लोकेशन यानी सही स्थिति की जानकारी और प्लॉट का नाम तक दे दिया गया। इसके लिए आसपास के प्लॉट का नंबर लिख उसके आगे अंग्रेजी भाषा का ए शब्द जोड़ दिया गया। जो एक नया नाम और पता बन गया। इस जमीन के प्लॉट के टुकड़ों की टीडीआई ने दिल्ली के पार्टियों के नाम रजिस्ट्री करा दी। जिनमें से दो रजिस्ट्री करीब तीन माह पहले और एक संदिग्ध रजिस्ट्री करीब चार साल पहले कराई गई है। इनमें स्टांप ड्यूटी की भी बड़े स्तर पर चोरी की गई है।
जिला योजनाकार ने सभी पंजीकरण दस्तावेजों के सबूत जुटा लिए हैं। इनकी रिपोर्ट मुख्यालय भेजी जा रही है। जिस पर मुख्यालय को सूचित कर टीडीआई का लाइसेंस रद्द करने की अनुशंसा भी की जा रही है। इसके अलावा घपले में संलिप्त लोगों पर भी एफआईआर दर्ज करवाने की अनुशंसा की गई है। विशेष बात ये है कि इस मामले में संलिप्त दो नायब तहसीलदारों का अब तबादला हो चुका है, जबकि डीआरओ मौजूदा कार्यभार संभाल रहे हैं।
इस प्रकार किया घोटाला
उदाहरण के तौर पर मान लीजिए एक प्लॉट का नंबर 100 है। इसके आगे या साथ में अनिर्धारित भूमि को हरियाली के लिए आरक्षित कर दिया गया है। अब जालसाजों ने इस प्लॉट की स्थिति और पता एवं लोकेशन बनाने के लिए इस जमीन के टुकड़े को ए-100 का नाम दे दिया और विक्रेता के तौर पर टीडीआई प्रबंधन तहसील में रजिस्ट्री कराने पहुंच गया और क्रेता पक्ष को बुलाकर अधिकारियों की सांठगांठ से तहसील में जमीन के टुकड़े को पंजीकृत करवा दिया गया। इस सौदे में सरकार की स्टांप ड्यूटी चुराने से लेकर सरकार को भी करोड़ों का फटका लगाया गया है। अधिकारियों की पहली जांच में इस प्रकरण में तहसील और टीडीआई को संलिप्त माना गया है।
ये आई जांच के घेरे में
पहले प्लॉट की रजिस्ट्री के स्टांप मई 2020 के थे, लेकिन पंजीकरण अक्टूबर 2020 में कराया गया। जोकि प्लाॅट नंबर ए-196 की बताई जा रही है। इसमें स्टांप ड्यूटी 197600 की दर्शाई गई है। जबकि खरीद 45.08 लाख की बताई गई है। इसे तत्कालीन नायब तहसीलदार ने पंजीकृत किया है। ये 450 गज का प्लॉट था। दूसरे प्लॉट की रजिस्ट्री करीब तीन माह पहले मार्च 2024 में हुई है। ये 200 गज का प्लॉट नंबर ए-187-ए है। इसकी स्टाप ड्यूटी 25 हजार की है। जबकि प्लॉट की खरीद महज पांच लाख में हुई है। खास बात यह है कि इसके स्टांप और पंजीकरण एक ही दिन हुआ है। जो डीआरओ कार्यालय की ओर से किया गया है। इसी प्रकार तीसरे 200 गज के प्लॉट नंबर ए-166-ए का पंजीकरण ठीक दस दिन बाद मार्च 2024 में ही हुआ है। जिसके स्टांप एक दिन पहले खरीदे और अगले दिन पंजीकरण कराया गया। इसमें स्टांप ड्यूटी केवल 30 हजार की भरी, जबकि खरीद की कीमत केवल पांच लाख निर्धारित की गई है। यानी इन 200 गज के प्लॉटों को महज पांच लाख में ही खरीदा गया। जबकि यहां का कलेक्टर रेट भी 23 हजार रुपये गज का था। जिसे 2500 रुपये गज लगा दिया गया।
वर्जन:
मामला संज्ञान में है। इसकी गहनता से जांच हो रही है। मुख्यालय को भी पत्राचार कर टीडीआई का लाइसेंस रद्द करने के लिए लिखा जा रहा है। वहीं, इस प्रकरण में शामिल लोगों के लिए एफआईआर दर्ज करवाई जाएगी।
प्रवीण चौहान, डीटीपी, पानीपत।