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ावन मास एवं श्रवण कुमार दोनों ही भारतीय संस्कृति के मूल : दाऊजी महाराज

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पानीपत। सावन मास एवं श्रवण कुमार दोनों ही भारतीय संस्कृति के मूल हैं। सावन मास में भक्ति की प्रेरणा को लिया जा सकता है और श्रवण कुमार से माता पिता की भक्ति का अनुपालन किया जा सकता है। दोनों ही कुछ न कुछ प्राप्ति का स्थल हैं। उक्त विचार श्री अवध धाम मंदिर के संस्थापक प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. दाऊजी महाराज ने अवध धाम मंदिर में आयोजित रुद्राभिषेक कार्यक्रम के दौरान कहे।
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कुटानी रोड स्थित श्री अवध धाम मंदिर में पंच दिवसीय पार्थिव शिवलिंग महानिर्माण एवं महामृत्युंजय जप एवं महारुद्राभिषेक का आयोजन किया जा रहा है। रुद्राभिषेक के द्वितीय दिवस पर दाऊजी महाराज के अध्यक्षता में एवं राधे-राधे महाराज के सानिध्य में काशी बनारस एवं वृंदावन से पधारे विद्वान ब्राह्मणों की ओर से वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पार्थिव शिवलिंग का पूजन प्रारंभ किया गया। सर्वप्रथम सुबह ब्रह्म मुहूर्त के अंदर माटी के अंदर विभिन्न प्रकार की वैदिक औषधियों एवं गंगाजल मिलाकर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण शुद्ध माटी से किया गया एवं वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ उनका आह्वान किया गया एवं उनकी स्थापना की गई। स्थापना के उपरांत चमक नमक विधि से एवं पावन पवित्र ग्रंथ रुद्री से भगवान का रुद्राभिषेक किया गया। आज अवध धाम मंदिर के पावन परिसर में सैकड़ों व्यक्तियों ने दुग्ध धारा के साथ अभिषेक किया। 1008 बेल पत्रों के साथ भगवान शंकर की आराधना उपासना की गई।
ज्योतिषाचार्य पंडित दाऊजी महाराज ने कहा कि सावन मास में शंकर जी की प्राप्ति एवं भक्ति की प्राप्ति सरलता से की जा सकती है और श्रवण कुमार से माता-पिता की भक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। दोनों ही हमारी भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र है। वह पुत्र ही क्या जो अपने माता पिता की सेवा नाकरें और अपने जीवन को व्यर्थ कर दें। शास्त्र यह भी कहते हैं कि माता पिता के चरणों में ही चारों धाम होते हैं, उनकी पूजन करने से ही व्यक्ति के अंदर सभी ग्रंथों का, सभी शास्त्रों का, सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।
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कथावाचक पं. राधे-राधे महाराज ने कहा कि सावन मास अति पुनीत मास होता है। 12 महीनों में सबसे शुद्ध एवं पवित्र सावन मास को माना गया है। सावन मास के अंदर भगवान शंकर की उपासना अति कल्याणकारी एवं सुगम होती है। राधे-राधे महाराज ने कहा कि दानी वही होता है जो अपने दान का प्रवक्ता ना बने। गुप्त रूप से किया गया दान गुप्त गोदावरी के समान होता है। जिस प्रकार से नदियों का उद्गम स्थान गुप्त होता है, जो गुप्त होता है, वही विशाल हो सकता है, जो गुप्त नहीं है वो लुप्त हो जाता है। इसलिए गुप्त बनना सीखें। जब गुप्त रहेंगे तो आप उतने ही विशाल हो जाएंगे, जैसे गुप्त गोदावरी, गोमुख के अंदर गंगा। यह विशाल पावन पवित्र नदियां किस प्रकार से अपने उद्गम स्थान को गुप्त रखती हैं और फिर बाद में करोड़ों लोगों की जीविका एवं जीवंत बनती हैं। जो विशाल होगा, वही निश्चित तौर पर गुप्त होगा, ऐसा शास्त्र कहते हैं। इसलिए अपने आप को और अपने दान को गुप्त रखना चाहिए।
इस अवसर पर सुबोध कंसल, जुगल कंसल, धीरज छाबड़ा, सतीश तागरा, राजेंद्र ग्रोवर, राकेश ग्रोवर, डॉ. रमेश चुघ, सुरेंद्र ढींगरा, नंदकिशोर छाबड़ा, विमला गोयल, रणवीर देशवाल, वेद पराशर, अशोक नारंग, सुबोध गुप्ता, योगेश गुप्ता समेत सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
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