पानीपत। जैन मुनि संभव और साध्वी अंशिमा ने बड़ी दीक्षा पाठ कर साधु जीवन में प्रवेश कर लिया। श्री एसएस जैन सभा गांधी मंडी में वीरवार को दोनों को बड़ी दीक्षा का पाठ कराया गया। राष्ट्रसंत उत्तर भारतीय प्रवर्तक सुभद्र मुनि महाराज ने नव दीक्षित संभव मुनि महाराज व साध्वी अंशिमा को बड़ी दीक्षा का पाठ कराया।
उन्होंने जैन संतों के पांच महाव्रतों की गहन व्याख्या भी की गई। इसमें पहला महाव्रत अहिंसा का है। एक जैन संत एक इंद्रिय यानी पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय व वनस्पतिकाय से लेकर पंचेन्द्रिय तक किसी भी प्राणी की मन से, वचन से या काया से हिंसा नहीं करता और न ही दूसरों से करवाता है। हिंसा करने वालों को अच्छा नहीं समझता है। दूसरा महाव्रत सत्य का है। जैन संत असत्य या अप्रिय नहीं बोलते हैं। तीसरा महाव्रत अचोर्य है। यानी जैन संत बिना किसी की दी हुई चीज नहीं लेते। चौथा ब्रह्मचर्य है। यानी वे विवाह नहीं करते और ब्रह्मचर्या में ही लीन रहते हैं। पांचवां अपरिग्रह है। जैन संत जर, जोरू व जमीन के सर्व त्यागी होते हैं। छठा महाव्रत भी जोड़ दिया जाता है और वह है रात्रि भोजन त्याग का। जैन संत रात्रिकाल कुछ भी ग्रहण नहीं करते। यहां तक कि बीमारी में आवश्यक जीवन रक्षक औषधि भी नहीं लेते हैं।
संभव मुनि महाराज के धर्म परिवार के भगत महावीर प्रसाद जैन व वीरेंद्र जैन द्वारा सबके लिए सात्विक भोजन की व्यवस्था की गई। साध्वी अंशिका महाराज के धर्म परिवार संजय जैन, चक्षु जैन व देवेश जैन द्वारा प्रसाद की व्यवस्था की गई।