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सावन में सज गए शिवालय, एक माह होगी भगवान भोलेनाथ की पूजा

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पानीपत। भगवान भोले नाथ का प्रिय माह सावन शुरू हो चुका है। इस अवसर पर विभिन्न मंदिरों में भगवान भोलेनाथ की पूजा को लेकर शिवालयों में विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं। जिसके चलते मंदिरों में स्थापित शिवलिंगों को रोजाना आकर्षक ढंग से सजाया जाएगा।
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वीरवार को श्रावण मास के पहले दिन हर-हर महादेव के जयकारों से शिवालय गूंज उठे। मंदिरों में भोलेनाथ के दर्शनों के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु उमड़े हुए थे। कई बड़े शिवालयों में इस दौरान भक्तों की लंबी कतारें भी देखने को मिली।
शिव भक्त सुबह से ही अपने आराध्य भोलेनाथ का अभिषेक करने के लिए शिवालयों में परिवार सहित पहुंचे। लोगों ने हर-हर महादेव के जयकारों के साथ भगवान का जलाभिषेक किया। मंदिर कमेटियों ने इसकी तैयारी पहले से ही कर ली थी। शहर के सभी प्रमुख मंदिरों ऐतिहासिक देवी मंदिर, गीता मंदिर, प्रेम मंदिर, श्री अवध धाम मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, श्री सनातन धर्म मंदिर, श्री राम मंदिर, श्री राधा-कृष्ण मंदिर, पंचवटी मंदिर समेत विभिन्न मंदिरों में शिव दरबार व शिवलिंग को भव्य रूप से सजाया गया। सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया और पूजा अर्चना की।
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श्री अवध धाम मंदिर से ज्योतिषाचार्य पंडित राधे-राधे ने बताया कि सनातन हिंदू धर्म में सभी महीने, नक्षत्र आदि पूज्य हैं और सभी महीनों व अतिथियों आदि के अधिष्ठात्री देवता भी होते हैं। इसी परंपरा में श्रावण मास संवत का पांचवां महीना पड़ता है। श्रावण मास के अधिष्ठात्री देवता भगवान महादेव हैं। इसलिए श्रावण में भगवान शिव जी की पूजा सभी श्रद्धालु बड़े ही श्रद्धा भाव से करते हैं।
- सावन में होंगे चार सोमवार व्रत
पंडित जी ने कहा कि इस पवित्र महीने में शिव पुराण की कथा सुनना भी अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। उन्होंने कहा कि जो शिव कथा सुनते हैं, भगवान गौरी शंकर उस श्रोता के हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं।
इस वर्ष सावन महीने में चार सोमवार, दो प्रदोष व एक मासिक शिवरात्रि के व्रत होंगे। पवित्र श्रावण मास 12 अगस्त पूर्णिमा को समाप्त होगा। इस महीने का पहला सोमवार 18 जुलाई, दूसरा सोमवार 25 जुलाई, तीसरा सोमवार 1 अगस्त, आखिरी चौथा सोमवार 8 अगस्त को होगा।
26 जुलाई को होगा जलाभिषेक
पंडित जी ने बताया कि शिवरात्रि 26 जुलाई मंगलवार को है। शिवरात्रि पर भगवान भोले नाथ को जलाभिषेक किया जाता है। इससे पूर्व कावड़िए गंगाजल लाने के लिए हरिद्वार की ओर प्रस्थान करते हैं। गंगा में स्नान कर गंगाजल व कावड़ लेकर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करते हैं।
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