पानीपत। जिले की झुग्गियों, फैक्ट्रियों व ईंट भट्ठों पर रहने वाली 50-60 प्रतिशत महिलाओं, बच्चों और किशोरों में खून की कमी है। स्वास्थ्य विभाग ने इसके लिए 12 जून को 100 दिन का एनिमिया मुक्त अभियान शुरू किया था। स्वास्थ्य विभाग को उम्मीद थी कि इन 100 दिनों में वह लगभग तीन लाख बच्चों व महिलाओं तक पहुंचेंगे लेकिन 22 दिन तक चली एनएचएम की हड़ताल से अभियान को ठप कर दिया। अब सिविल सर्जन इस अभियान को नए सिर से शुरू करने की प्लानिंग कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि अभियान के तहत एनीमिया के रोगियों को चिह्नित कर उनका इलाज किया जाना था। अभियान को शुरू हुए 75 दिन हो चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग तक लगभग 10 हजार महिलाओं व बच्चों की ही जांच कर पाया है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जिले की 60 प्रतिशत गर्भवतियों में खून की कमी है। 20 प्रतिशत गर्भवतियों में तो आठ ग्राम से भी कम खून है। वहीं 55 प्रतिशत बच्चों में भी खून की कमी है। 25 प्रतिशत से अधिक बच्चे गंभीर एनिमिक की श्रेणी में आते हैं। इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने पहली बार 100 दिन का एनीमिया मुक्त अभियान शुरू किया था। अब इस अभियान को दोबारा गति दी जाएगी। सामान्य मरीजों को पहले की तरह प्राथमिक स्तर पर आयरन की दवा दी जाएगी। वहीं अब गंभीर एनीमिया रोगियों को दवाएं देने के साथ जब तक ये ठीक नहीं होते तब इनकी मॉनिटरिंग कर फीडबैक भी लिया जाएगा। मॉनिटरिंग के लिए आशा वर्कर को इस अभियान से जोड़ा गया है।
वर्जन-
सिविल सर्जन डाॅ. जयंत आहूजा ने बताया कि एनएचएम की हड़ताल के कारण एनीमिया मुक्त अभियान थोड़ा प्रभावित हुआ है। अब अभियान को गति दी जाएगी। इसके लिए अलग से प्लानिंग की जा रही है। उनका उद्देश्य है कि अधिक से अधिक महिलाओं व बच्चों तक टीमें पहुंचे। उनकी जांच हो सके। अभियान के दौरान झुग्गियों, फैक्ट्रियों व ईंट भट्ठों पर रहने वालों पर स्वास्थ्य विभाग का फोकस है। सामान्य, मध्यम व गंभीर एनीमिया के रोगियों के वर्ग बनाए गए हैं। पानीपत में एनीमिया बड़ी चुनौती है। हर महीने हाेने वाली गर्भवतियाें की जांच में भी 60 फीसदी गर्भवतियों में खून की कमी मिलती है। पानीपत में इससे पहले ये अभियान सात दिनाें के लिए हर तीन महीने के बाद तक चलता था।